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Birth Anniversary oF Kanshiram: बसपा के संस्थापक कांशीराम की 87वीं जयंती

देश के लोकप्रिय नेताओं में शुमार समाज सुधारक और बहुजन समाज पार्टी (BSP) के संस्थापक कांशीराम (Kanshiram) की आज 87वीं जयंती है

लखनऊ: देश के लोकप्रिय नेताओं में शुमार समाज सुधारक और बहुजन समाज पार्टी (BSP) के संस्थापक कांशीराम (Kanshiram) की आज 87वीं जयंती है। सन 1982 में कांशीराम ने ‘द चमचा युग’ (The Era of the Stooges) नामक पुस्तक लिखी। जिसमें उन्होंने दलित नेताओं के लिए चमचा (Stooge) शब्द का इस्तेमाल किया था। उन्होंने कहा था कि ये दलित लीडर केवल अपने निजी फायदे के लिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस जैसे दलों के साथ मिलकर राजनीति करते हैं।

बसपा (BSP) की स्थापना

कांशीराम का जन्म सन् 1934 में 15 मार्च को पंजाब के जिला रूपनगर, पिर्थीपुर बुंगा ग्राम, खवसपुर में हुआ था। वह एक भारतीय राजनीतिज्ञ और समाज सुधारक थे। उन्होंने बहुजनों के राजनीतिक एकीकरण और उत्थान के लिए कार्य किया है। इसके अन्त में उन्होंने दलित शोषित संघर्ष समिति डीएसएसएसएस (DSSS) 1971 में अखिल भारतीय पिछड़ा और अल्पसंख्यक समुदायों कर्मचारी महासंघ (बामसेफ) और 1984 में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) BSP की स्थापना की।

जातिगत भेदभाव का अनुभव

कांशीराम साहब (Kanshiram Sahib) ने सरकार की सकारात्मक कार्रवाई की योजना के तहत पुणे में विस्फोटक अनुसंधान और विकास प्रयोगशाला को ज्वाइन कर लिया। यह वह समय था जब उन्होंने पहली बार ‘जातिगत भेदभाव’ का अनुभव किया। कैसे? उन्होंने ऑफिस में देखा कि जो कर्मचारी डॉक्टर आंबेडकर (Dr. Ambedkar) का जन्मदिन मनाने के लिए छुट्टी लेते थे उनके साथ ऑफिस में भेदभाव किया जाता था। वे इस जातिगत भेदभाव को खत्म करने के लिए 1964 एक दलित सामाजिक कार्यकर्ता बन गए थे। उनके करीबी लोगों के अनुसार उन्होंने यह निर्णय डॉक्टर आंबेडकर की किताब ‘एनीहिलेशन ऑफ कास्ट’ (Annihilation of Cast) को पढ़कर लिया था। कांशीराम को बी. आर. अम्बेडकर और उनके दर्शन ने काफी पभावित किया था।

RPI का समर्थन

कांशीराम साहब ने शुरू में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (RPI) का समर्थन किया था लेकिन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ जुड़े रहने के कारण उनका इस पार्टी से मोह भंग हो गया था। इसके कारण उन्होंने 1971 में अखिल भारतीय एससी, एसटी, ओबीसी (SC, ST, OBC) और अल्पसंख्यक कर्मचारी संघ की स्थापना की जो कि बाद में चलकर 1978 में BAMCEF बन गया था।

 

BAMCEF एक ऐसा संगठन था जिसका उद्देश्य अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य वर्गों और अल्पसंख्यकों के शिक्षित सदस्यों को अम्बेडकरवादी सिद्धांतों का समर्थन करने के लिए राजी करना था। BAMCEF ने तो एक राजनीतिक और न ही एक धार्मिक संस्था थी और इसका अपने उद्देश्य के लिए आंदोलन करने का भी कोई उद्देश्य नहीं था। सूर्यकांत वाघमोर कहते हैं, इस संगठन ने दलित समाज के उस संपन्न तबके को इकठ्ठा करने का काम किया जो कि ज्यादातर शहरी क्षेत्रों, छोटे शहरों में रहता था और सरकारी नैकारियों में काम करता तह साथ ही अपने-अपने अछूत भाई बहनों से भी किसी तरह के संपर्क में नहीं था।

दलित शोषित समाज संघर्ष समिति

इसके बाद कांशीराम साहब ने 1981 में एक और सामाजिक संगठन बनाया, जिसे दलित शोषित समाज संघर्ष समिति (डीएसएसएस, या DS4) के नाम से जाना जाता है। उन्होंने दलित वोट (Dalit vote) को इकठ्ठा करने की अपनी कोशिश शुरू की और 1984 में उन्होंने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की स्थापना की। उन्होंने अपना पहला चुनाव 1984 में छत्तीसगढ़ की जांजगीर-चांपा सीट से लड़ा था। बीएसपी (BSP) को उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) में सफलता मिली, शुरू में दलितों और अन्य पिछड़े वर्गों के बीच विभाजन को पाटने के लिए संघर्ष किया किन बाद में मायावती (Mayawati) के नेतृत्व में इस खाई को पाटा गया।

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