जन्मदिन विशेष: बनारस की गलियां तुम बिन बूढ़ी हो चली बिस्मिल्लाह…

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पूरी दुनिया में चाहे हम जहां चले जाएं हमें सिर्फ हिन्दुस्तां दिखाई देता है.. और हिन्दुस्तां के किसी शहर में चले जाए तो हमें सिर्फ बनारस दिखाई देता है। अपने लबों पर अक्सर ये जिक्र लिए बिस्मिल्ला खां किसी परिचय के मोहताज नहीं है। कहा जाता है उन्हें अपने बनारस से बहुत प्यार था। अपनी शहनाई को बेगम मान चुके बिस्मिल्लाह खां के दिल में हिन्दुस्तां तो जुबां पर बनारस बसता था।

कभी एक जमाना हुआ करता था जब उनकी शहनाई से पूरे बनारस में जान सी आ जाती थी। उन्होंने दुनिया को अलविदा क्या कहा मानों वहां की गलियां उनकी बिना बूढ़ी ही हो चली।

अपनी शहनाई के सुर से पूरी दुनिया में ऊंचा मुकाम हासिल कर चुके बिस्मिल्लाह खां का आज जन्मदिन है। 21 अगस्त 2006 को वह दुनिया से रुखसत हो गए बिस्मिल्ला खां की आज 102वां जन्मदिवस है। उन्हें पद्म विभूषण, पद्म भूषण, पद्मश्री, तानसेन समेत दर्जनों अवॉर्ड्स से नवाजा जा चुका है।

बिस्मिल्लाह खां भले ही शिया मुसलमान थे, फिर भी वह अन्य हिन्दुस्तानी संगीतकारों की तरह धार्मिक रीति रिवाजों के प्रबल पक्षधर थे। वह काशी के बाबा विश्वनाथ मंदिर में जाकर तो शहनाई बजाते ही थे। साथ ही वह ये भी कहते थे कि मजहब बैर करना नहीं सिखाता, वो सिर्फ एकमात्र प्यार करना सिखाता है।

बिस्मिल्लाह खां देश के चुनिंदा कलाकारों में से एक हैं जिन्हें आजदी के मौके पर साल 1947 में लाल किले पर शहनाई बजाने का मौका मिला था।

इसके अलावा गंगा किनारे बैठकर घंटों रियाज भी किया करते थे। वह पांच बार के नमाजी थे, हमेशा त्यौहारों में बढ़-चढ़ कर भाग लेते थे। लोग बताते हैं कि वह बनारस छोड़ने के ख्याल से ही इस कारण व्यथित होते थे कि गंगाजी और काशी विश्वनाथ से दूर नहीं रह सकते थे। उनके लिए संगीत ही उनका धर्म था।

अपने काम को ईश्वर की तरह पूजते थे। यही वजह है कि जब उस्ताद बिस्मिल्लाह की मृत्यु हुई, तो उनकी शहनाई को उनकी चिता के साथ जला दिया गया। अपने संगीत के जरिये वह शांति, एकता और प्यार फैलाते थे। हमेशा उनकी जुबां पर एक ही लफ्ज रहते थे कि ‘संगीत की कोई जात-पात नहीं है।

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