CEA का बयान, कहा- पॉलिसी बनाते समय ‘अर्थशास्त्र’ जैसे पुराने सिद्धांतों को इग्नोर…

नई दिल्ली: केंद्र सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार कृष्णमूर्ति सुब्रमणियन ने शनिवार को कहा कि 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद चहेते औद्योगिक घराने के साथ साठ-गांठ से नीति तय करने (क्रोनी कैपिटलिज्म) का चलन कम हुआ है, लेकिन देश को इससे पूरी तरह उबरकर सम्पूर्ण व्यवसाय जगत के अनुकूल नीतियां बनाने की अवस्था में पहुंचने में अभी कुछ और दूरी तय करनी बाकी है.

उन्होंने कहा कि जब पूरे कारोबार जगत को ध्यान में रखकर नीतियां बनायी जायेंगी, तभी बाजार के अदृश्य हाथों को बल मिलेगा (बाजार कारगर होगा) और यही देश को पांच हजार अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था के लक्ष्य तक पहुंचाएगा. उन्होंने आईआईटी कानपुर के अपने सहपाठियों व संस्थान के अन्य बैच के लोगों के एक कार्यक्रम में कहा, ‘‘कारोबार के अनुकूल नीतियां वे होती हैं, जो देश में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देती हैं. हमें बाजार के अदृश्य हाथों को ताकत देने के लिये इससे (साठ-गांठ कर नीतियां बनाने से) बचने की जरूरत है.’’

नीति निर्माण प्रक्रिया पर लगते रहे हैं आरोप
भारत की नीति निर्माण प्रक्रिया पर आरोप लगता आया है कि स्वतंत्रता के बाद से 1991 में हुए उदारीकरण तक सिर्फ कुछ कारोबारियों को ध्यान में रखकर नीतियां बनायी गयीं. सुब्रमणियन ने साठ-गांठ के घटते प्रतिफल की ओर संकेत करते हुए कहा कि दूरसंचार स्पेक्ट्रम आवंटन को लेकर 2011 में कैग की रिपोर्ट आने के बाद ऐसी कंपनियों में निवेश पर कमाई शेयर सूचकांकों में वृद्धि की दर से काफी कम रही, जो ‘संपर्कों वाली’ कंपनी मानी जाती हैं.

सुब्रमणियन ने नीति निर्माण की प्रक्रिया में अर्थव्यवस्था के हालिया सिद्धांतों पर ही निर्भर हो जाने के अर्थशास्त्र जैसे प्राचीन ग्रंथों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर देने को भी गलत बताया. उन्होंने कहा, ‘‘पिछले 100 साल में जो लिखा गया, सिर्फ वही विद्वता नहीं है बल्कि यह सदियों पुरानी चीज है.’’

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