नहाय-खाय परम्परा के साथ चार दिवसीय डाला छठ पर्व शुरु, झूलेलाल घाट पर प्रशासन ने लिया तैयारियों का जायजा

इस बार छठ पूजा का विशेष आयोजन झूलेलाल घाट पर हो रहा है। बुधवार को जिलाधिकारी, नगर आयुक्त समेत जोनल अधिकारियों ने स्थलीय निरीक्षण करते हुए घाटों की साफ-सफाई व प्रकाश की समुचित व्यवस्था कराने के निर्देश दिये।

लखनऊ। चार दिवसीय डाला छठ पर्व का नहाय-खाय परम्परा के साथ शुभारम्भ हो गया। बुधवार को राजधानी के अलग अलग इलाकों में लोगों ने घरों की साफ-सफाई, स्नान-ध्यान और दिन में एक समय चावल और लौकी की सब्जी खाकर व्रत की शुरुआत की। वहीं गोमती तटों पर सफाई के साथ पूजा की वेदी श्रीशोभिता बनाने का कार्य भी जारी रहा।

झूलेलाल घाट पर प्रशासन ने लिया तैयारियों का जायजा

इस बार छठ पूजा का विशेष आयोजन झूलेलाल घाट पर हो रहा है। बुधवार को जिलाधिकारी, नगर आयुक्त समेत जोनल अधिकारियों ने स्थलीय निरीक्षण करते हुए घाटों की साफ-सफाई व प्रकाश की समुचित व्यवस्था कराने के निर्देश दिये। यहां अन्तर्राष्ट्रीय भोजपुरी सेवा न्यास द्वारा गोमती तट की सफाई हेतु श्रमदान किया गया। श्रमदान अभियान में न्यास के अध्यक्ष परमानन्द पाण्डेय, उपाध्यक्ष दुर्गा प्रसाद दुबे एवं दिग्विजय मिश्र, संयुक्त सचिव राधेश्याम पाण्डेय, महासचिव एस.के.गोपाल, विशेष कार्याधिकारी अखिलेश द्विवेदी, दशरथ महतो, अनिल पांडेय, राकेश तिवारी, पुनीत निगम, उमाकान्त मिश्र, प्रसून पाण्डेय आदि लोग सम्मिलित हुए। नगर निगम, जोन 3 के जोनल अधिकारी राजेश कुमार, मनकामेश्वर वार्ड के पार्षद प्रतिनिधि रंजीत कुमार समेत नगर निगम के अधिकारी व कर्मचारी तैयारियों में जुटे हैं। बुधवार को जेसीबी मशीन द्वारा घाट के पूर्वी हिस्से का समतलीकरण कराया गया।

घाट पर न लगायें भीड़, घर पर ही करें अर्घ्यदान

अन्तर्राष्ट्रीय भोजपुरी सेवा न्यास के अध्यक्ष परमानन्द पाण्डेय ने व्रतियों से अपील किया कि वे कोविड संकट को ध्यान में रखते हुए घाट पर भीड़ न लगायें तथा यथासम्भव घर अथवा आस पास के पार्कों में अर्घ्य देने का प्रयास करें। उन्होंने बताया कि कोविड के चलते आयोजन में अपेक्षाकृत कम लोगों को बुलाया गया है तथा मास्क व समुचित शारीरिक दूरी बनाकर ही कार्यक्रम में सम्मिलित होने की अपील की गई है। सीमित उपस्थिति में बीस नवम्बर को अपराह्न से इक्कीस नवम्बर की प्रातः तक न्यास द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम भी कराये जा रहे हैं।

भोजपुरी काव्य संगोष्ठी गुरुवार को

न्यास द्वारा 19 नवम्बर को हनुमान सेतु के निकट झूलेलाल वाटिका स्थित गोमती तट पर भोजपुरी कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया है। सुपरिचित भोजपुरी कवि गिरिजाशंकर दुबे ‘गिरिजेश’ की अध्यक्षता व सचिवालयकर्मी सीमा गुप्ता के संचालन में सायं चार बजे से होने वाले कार्यक्रम में ख्यातिलब्ध कवियों का काव्य पाठ होगा।

रामराज्य की शुरुआत छठ पूजा से

न्यास के उपाध्यक्ष दुर्गा प्रसाद दुबे ने बताया कि छठ पर्व में सूर्य की पूजा का संबंध भगवान राम से भी माना जाता है। दशहरा से लेकर छठ तक एक क्रम में मनाया जाने वाला त्योहार भगवान राम से भी जुड़ा हुआ है। दशहरा के दिन भगवान राम ने रावण का वध किया था। दीपावली के दिन 14 साल के बाद अयोध्या लौटे थे। मान्यता है कि दीपावली से छठे दिन भगवान राम ने सीता के संग अपने कुल देवता सूर्य की पूजा सरयू नदी में की थी। भगवान राम ने देवी सीता के साथ षष्ठी तिथि का व्रत रखा और सरयू नदी में डूबते सूर्य को फल, मिष्ठान्न एवं अन्य वस्तुओं से अर्घ्य प्रदान किया था। सप्तमी तिथि को भगवान राम ने उगते सूर्य को अघ्र्य देकर सूर्य देव का आशीर्वाद प्राप्त किया। इसके बाद राजकाज संभालना शुरु किया।

मोरे घाटे दूबिया उपज गइले…

सूर्यषष्ठी के दिन ही व्रती घाट पर जुटते हैं। शेष दिनों में घाट वीरान रहते हैं। छठ के लोक गीतों में ‘कोपि कोपि बोलेली छठिय मइया, सुनीं ए सेवक लोग, मोरे घाटे दुबिया उपजि गइले मकरा बसेर लेहले’ में छठी माई के क्रोधित होने पर सेवक व्रती द्वारा घाट की सफाई करने का संकल्प लिया जाता है जिसमें स्वच्छता अभियान की प्रेरणा होती है।

छठ पूजन का दूसरा दिन ‘खरना’ गुरुवार को

छठ पर्व के दूसरे दिन को खरना या लोहंडा के नाम से जाना जाता है। खरना का अर्थ है पूरे दिन का उपवास। कार्तिक महीने के पंचमी को इसे मनाया जाता है। इस दिन व्रती पूरे दिन व्रत रखते हैं अर्थात सूर्यास्त से पहले पानी की एक बूंद तक ग्रहण नहीं करते। सायंकाल चावल, गुड़ और गन्ने के रस का प्रयोग कर रसियाव (खीर) बनाया जाता है।  खाना बनाने में नमक और चीनी का प्रयोग नहीं किया जाता है। शाम को व्रती द्वारा भगवान सूर्य की पूजा की जाती है और प्रसाद को भगवान को अर्पित करके उसी घर में ‘एकान्त’ करते हैं अर्थात् एकान्त रहकर उसे ग्रहण करते हैं।

परिवार के सभी सदस्य उस समय घर से बाहर चले जाते हैं। एकान्त में प्रसाद ग्रहण करते समय व्रती हेतु किसी तरह की आवाज सुनना पर्व के नियमों के विरुद्ध है। प्रसाद ग्रहण करने के उपरान्त व्रती अपने सभी परिजनों एवं कुटुम्बों को ‘रसियाव-रोटी’ का प्रसाद खिलाते हैं। इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को ‘खरना’ कहते हैं। चावल का पिठ्ठा व घी लगी रोटी भी प्रसाद के रूप में वितरित की जाती है। इसके बाद अगले 36 घंटों के लिए व्रती निर्जला व्रत रखते हैं। मध्य रात्रि को व्रती छठ पूजा के लिए विशेष प्रसाद ठेकुआ बनाती हैं।

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