दाहिने हाथ में लेखनी, बांए हाथ में दवात लिए ब्रह्मा के चित्त से प्रगट हुए थे चित्रगुप्त, कल इस शुभ मुहूर्त में करें पूजा

सोमवार को सर्वार्थ सिद्धि योग सुबह 06ः45 से दोपहर 02ः37 तक है। विजय मुहूर्त दोपहर 01ः53 बजे से दोपहर 02ः36 तक है। अभिजित मुहूर्त दिन में 11ः44 बजे से दोपहर 12ः27 बजे तक है। बिना कलम की पूजा किये हुए चित्र गुप्त वशंज पानी नही पीते है।

लखनऊ: चित्रगुप्त वशंज 16 नवम्बर को कलम (लेखनी) की पूजा करेगे। कार्तिक शुक्ल द्वितीया तिथि का प्रारंभ 16 नवंबर को सुबह 07ः06 बजे से हो रहा है, जो 17 नवंबर को तड़के 03ः56 बजे तक है। ऐसे में आप चित्रगुप्त पूजा 16 नवंबर को करें।

इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग सुबह 06ः45 से दोपहर 02ः37 तक है। विजय मुहूर्त दोपहर 01ः53 बजे से दोपहर 02ः36 तक है। अभिजित मुहूर्त दिन में 11ः44 बजे से दोपहर 12ः27 बजे तक है। बिना कलम की पूजा किये हुए चित्र गुप्त वशंज पानी नही पीते है।

परमपिता ब्रह्मा के चरणों में आकर धर्मराज ने कहा ‘मुझे सहायक चाहिए’

प्रलय के अनन्तर परमपिता ब्रह्मा ने सृष्टि रचना का कार्य प्रारम्भ किया और मनुष्य सहित अन्य जीव जन्तुओं को उदय हुआ। कर्मफल की व्यवस्था संभाली धर्मराज ने, शुभकर्मों के फलस्वरूप पुण्य और अशुभ कर्मों के परिणाम में पाप का भागी होने की व्यवस्था दी गई। धर्मराज यह लेखा जोखा रखने में पूर्ण सक्षम थे। अतः सृष्टि व्यवस्था सुचारू चलती रही। धीरे -धीरे जनसंख्या बढ़ती, वंशावलियों का विस्तार हुआ, मानव शरीरों की संख्या गणना कठिन प्रतीत हुई, पाप-पुण्य का लेखा- जोखा रखना दुश्कर हुआ। धर्मराज आकुल व्याकुल होकर पहुंचे परमपिता ब्रह्मा के चरणों में और कहा ‘‘मुझे सहायक चाहिए, कार्याध्यक्ष चाहिए।’’

दाहिने हाथ में लेखनी, बांए हाथ में दवात लिए पितामह के चरणों में नतमस्तक हुए भगवान चित्रगुप्त

पितामह ध्यानमगन हुए, तप प्रारम्भ हुआ, एक हजार वर्ष बीत गए, शरीर में स्पन्दन हुआ, शुद्ध चैतन्य ब्रह्मा शरीर डोलायमान हुआ और प्रगट हुआ ब्रह्मा शरीर से तेजोदीप्त, दिव्य, स्थूल रूप, वर्ण तीसी के फूल के समान श्यामल, कण्ठ शंख के समान सुडौल, कण्ठ रेखा कबूतर के गले की रेखा के समान चिकनी, नेत्र कमल की पंखुरी के समान आकर्षक, हाथ आजानु दीर्घ, शरीर-सौष्ठव पूर्ण पीताम्बर-धारी, विद्युत सम आभावान्, दाहिने हाथ में लेखनी, बांए हाथ में दवात वे नवीन पुरूषाकृति पितामह के चरणों में नतमस्तक हुए। पितामह ने अपने प्रतिरूप सदृश पुरूष के हाथ उठाकर आशीर्वाद दिया। पुरूष ने पितामह से विनम्र भाव से कहा ‘‘पिता! कृपया मेरा नाम, वर्ण, जाति और जीविका का निर्धारण कीजिए।

पितामह ने उत्तर दिया ‘‘तुम मेरे चित्त में गुप्त रूप से वास करते थे अतः तुम्हारा नाम चित्रगुप्त हुआ। तुम मेरी काया में स्थित थे अथवा जो चैतन्य समभाव से सबकी काया से साक्षी है वही तुम में भी अन्तः है अतः वर्ण कायस्थ हुआ। तुम धर्म-अधर्म के विचार का लेखा -जोखा रख कर मानव जाति के अस्तित्व की रक्षा करोगे अतः जाति क्षत्रिय हुई। तुम विद्याध्ययन के माध्यम से ख्याति को प्राप्त होगे अतः जीविका पठन और लेखन हुई तुम्हारा वास स्थान पृथ्वी लोक में अवन्तिपुरी हुआ।’

मान्यता है कि भगवान चित्रगुप्त पूजा करने से गरीबी और अशिक्षा दूर होती है

शास्त्रों में कहा गया है कि भीष्म पितामह ने भी भगवान चित्रगुप्त की पूजा की थी। उनकी पूजा से खुश होकर पितामह को अमर होने का वरदान दिया था। मान्यता है कि उनकी पूजा करने से गरीबी और अशिक्षा दूर होती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सृष्टि के रचयिता भगवान बह्मा ने एक बार सूर्य के समान अपने ज्येष्ठ पुत्र को बुलाकर कहा कि वह किसी विशेष प्रयोजन से समाधिस्थ हो रहे हैं और इस दौरान वह यत्नपूर्वक सृष्टि की रक्षा करें। इसके बाद बह्माजी ने 11 हजार वर्ष की समाधि ले ली। जब उनकी समाधि टूटी तो उन्होंने देखा कि उनके सामने एक दिव्य पुरष कलम-दवात लिए खड़ा है।

बह्माजी  के परिचय पूछने पर भगवान चित्रगुप्त बोले  ‘मैं आप के शरीर से ही उत्पन्न हुआ हूं’

बह्माजी ने उसका परिचय पूछा तो वह बोला, ”मैं आप के शरीर से ही उत्पन्न हुआ हूं। आप मेरा नामकरण करने योग्य हैं और मेरे लिये कोई काम है तो बतायें।” बह्माजी ने हंसकर कहा, ”मेरे शरीर से तुम उत्पन्न हुए हो इसलिये ‘कायस्थ’ तुम्हारी संज्ञा है और तुम पृथ्वी पर चित्रगुप्त के नाम से विख्यात होगे।”धर्म-अधर्म पर धर्मराज की यमपुरी में विचार तुम्हारा काम होगा। अपने वर्ण में जो उचित है उसका पालन करने के साथ-साथ तुम संतान उत्पन्न करो। इसके बाद श्री ब्रह्माजी चित्रगुप्त को आशीर्वाद देकर अंतर्ध्यान हो गये।

भगवान चित्रगुप्त का विवाह एरावती और सुदक्षणा से हुआ। सुदक्षणा से उन्हें श्रीवास्तव, सूरजध्वज, निगम और कुलश्रेष्ठ नामक चार पुत्र प्राप्त हुये जबकि एरावती से आठ पुत्र रत्न प्राप्त हुये जो पृथ्वी पर माथुर, कर्ण, सक्सेना, गौड़, अस्थाना, अम्बष्ठ, भटनागर और बाल्मीक नाम से विख्यात हुये।

चित्रगुप्त ने अपने पुत्रों को धर्म साधने की शिक्षा दी और कहा कि वे देवताओं का पूजन पितरों का श्राद्ध तथा तर्पण और ब्राह्मणों का पालन यत्न पूर्वक करें। इसके बाद चित्रगुप्त स्वर्ग के लिए प्रस्थान कर गये और यमराज की यमपुरी में मनुष्य के पाप-पुण्य का विवरण तैयार करने का काम करने लगे।

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