इंजीनियरिग की पढ़ाई छोड़कर चुना खेती का रास्ता, 40 लाख की कर रहे कमाई

खेत
खेत

झारखण्ड: रांची से करीब 158 किलोमीटर दूर पलमू जिले में एक गाँव है हरिहर गंज. हरिहरगंज में रहने वाले दीपक की कहानी काफी दिलचस्प है. दीपक इंजीनियरिंग की पढाई करके इंजीनियर बने और नौकरी करने लगे. लेकिन उनकों ज्यादा दिन तक ये नौकरी रास नहीं आई. इसके बाद उन्होंने नौकरी छोड़कर गाँव जाने का फैसला किया. गाँव आने के बाद दीपक ने स्ट्रॉबेरी की खेती शुरू कर दी. करीब चार साल से स्ट्रॉबेरी की खेती कर रहे दीपक खेती से सालाना 40 लाख रुपये कमाते है. उन्होंने अपने इस काम में 60 किसानों को भी जोड़ रखा है. जिन्हें दीपक 10 हज़ार रुपये महिना देते है. उनके द्वारा उगाई स्ट्रॉबेरी पटना, रांची, कोलकाता, सिलिगुड़ी तक जाती है

स्ट्रॉबेरी
स्ट्रॉबेरी

दीपक बताते है की सबसे पहले उन्होंने हरियाणा में स्ट्रॉबेरी की खेती देखी थी. इसके बाद  उन्होंने इसके बारे में काफी जानकारियां इकठ्ठा की. फिर अपने गाँव में स्ट्रॉबेरी की खेती करने का निर्णय लिया. पहली बार जब दीपक ने 2017 में स्ट्रॉबेरी की खेती की तो उन्हें करीब 12 लाख रुपये का फायदा हुआ.

दीपक बताते है की इंजीनियरिंग की पढाई करके दिल्ली जैसे शहर से नौकरी छोड़कर आना काफी चुनौतीपूर्ण था. गाँव और पास-पड़ोस के लोग नौकरी न छोड़ने की सलाह देने लगे, कहने लगे नौकरी छोड़कर गलत कर रहे हो. खेती में क्या रखा है, पछताना पड़ेगा. लेकिन नौकरी में इतना दवाब था की उसे कर पाना बेहद मुश्किल था. मै हसना भूल गया था. इसके बाद मैंने अंत में किसी तरह खुद को नौकरी छोड़ने के लिए मना लिया.

स्ट्रॉबेरी
स्ट्रॉबेरी

दीपक ने जब पहली बार साल 2017 में स्ट्रॉबेरी की खेती शुरू की तब उन्होंने इसके लिए साढ़े तीन एकड़ जमीन चुनी. साल 2018 में उन्होंने खेती का दायरा बढ़ाते हुए करीब 6 एकड़ जमीन पर स्ट्रॉबेरी की खेती की. 2019 में 12 एकड़ जमीन पर दीपक ने खेती करने का फैसला किया. इसके लिए उन्होंने लीज पर जमीन ली.

दीपक कहने लगे जब पहली बार फसल की उपज कर रहा था तो कई तरह के सवाल परेशान करते थे, कि किसे बेचा जायेगा, कौन खरीदेगा. लेकिन उपज के बाद इन सारे सवालों का जवाब मिल गया. स्ट्रॉबेरी की मांग इतनी ज्यादा रहती है कि उसे बेचने के लिए ज्यादा जदोजहद नहीं करनी पड़ती.

दीपक ने बताया की इस काम में हर दिन 60 मजदूर लगते है. जिसमें 20 को ट्रेनिंग देकर उन्होंने 10 हज़ार रुपये महीने में रखा हुआ है. इसके आलावा बाकी लोग दिहाड़ी पर आते है, ये लोग सुबह नौ बजे से शाम 5 बजे तक काम करते है. जिन्हें रोज के हिसाब से दो-तीन सौ रुपये दिए जाते है. इनमें अधिकतर महिलाये है

दीपक के इस काम से उनके क्षेत्र के युवक इतने प्रोत्साहित है की वो भी इस काम को करना चाहते है. दीपक उन तमाम लोगों के लिए प्रेरणा है जिनके अन्दर कुछ कर गुजरने की चाहत है.

 

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