कांग्रेस में नहीं थम रही आपसी कलह, एक दूसरे को पटकने में लगे हैं पार्टी के नेता

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देहरादून। जब से कांग्रेस को 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में करारी हार मिली है तब से पार्टी में आपसी कलह भी तेज हो गई है। इसके साथ ही अब पार्टी के दिग्गज व वरिष्ट नेता भी एक दूसरे को पटखनी देने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं। हार का मलाल सभी को इतना है कि सब एक दूसरे पर ही इसका दोष मड़ रहे हैं। वहीं हाल ही में UPA की राष्ट्रपति उम्मीदवार मीरा कुमार उत्तराखंड आई हुई थी लेकिन इसकी सूचना किसी ने भी प्रदेश कांग्रेस के पूर्व मुखिया किशोर उपाध्याय को नहीं दी, जिसके कारण किशोर काफी नाराज हैं।

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कांग्रेस के नेता हार को नहीं कर पा रहे बर्दाश्त

दरअसल, जल्द ही राष्ट्रपति चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में मीरा कुमार राज्य में अपने लिए वोट मांगने आई थीं लेकिन इस बार मीरा कुमार के दून आगमन के मौके पर पहले आमंत्रण की सूचना नहीं देने, फिर विधायकों व सांसदों की बैठक में भीतर जाने से रोके जाने और इसके बाद बैठक में वरिष्ठ नेताओं के उपेक्षित व्यवहार से पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष किशोर उपाध्याय खफा हो गए।

किशोर की नाराजगी अभी बरकरार है। पार्टी के प्रदेश मुख्यालय राजीव भवन में पत्रकारों से बातचीत में किशोर अपना दर्द छिपा नहीं सके। उन्होंने यहां तक कहा कि उन्हें अपमानित कर कांग्रेस मजबूत होती है तो उन्हें ये भी मंजूर है।

किशोर यही नहीं रुके, उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की ‘दावतों’ पर तल्ख टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि इतनी बुरी हार के बावजूद इसतरह की पार्टी का कोई मतलब नहीं है। जब घर में बुरा हुआ तो कोई जश्न नहीं मनाता। खुद उन्होंने भी हार के चलते अपनी बेटी का जन्मदिन नहीं मनाया। उत्सव मनाने और दावत के लिए धैर्य रखना चाहिए। ऐसा वक्त जब आएगा तो यह भी होगा।

साथ ही कांग्रेस में आपसी कलह बहुत बढ़ गया है। ऐसे में पार्टी को फिर से मजबूत करने के लिए सभी दिग्गज नेताओं को अपनी-अपनी नाराजगी किनारे रखते हुए पार्टी को नए सिरे से वजूद में लाना होगा। यही नहीं, इस बार तो दो निर्दलीय विधायकों ने तो कांग्रेस का साथ छोड़ भाजपा का हाथ थाम लिया है।

जब से कांग्रेस हारी है तब से भले ही पार्टी की आलाकमान सोनिया गांधी इस बात को लेकर काफी चिंतित हो और कांग्रेस को वापस लाने का हर संभव प्रयास कर रही हों लेकिन उत्तराखंड कांग्रेस अब भी इस मामले को लेकर उतनी सक्रिय नहीं है जितना उन्हें होना चाहिए। ऐसे में कांग्रेस ने यह प्रयास नहीं किया कि वो अपने निर्दलीय विधायकों को अपने पास बनाए रखने की कोशिश करे।

उत्तराखंड से इस बार कांग्रेस के खाते में तकरीबन 27 फीसद वोट आ पाएंगे। कांग्रेस अपनी उम्मीदवार के लिए निर्दलीयों को रिझाने में कामयाब नहीं हो सकी। पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार केंद्र की सियासत में अहम जिम्मेदारी निभा चुकी हैं। दून में जब वह कांग्रेस विधायकों और सांसदों से मुलाकात को पहुंची तो 11 में से 10 विधायक और तीन राज्यसभा सांसदों में दो ही मौजूद थे।

हालांकि, दून में गैर मौजूद राष्ट्रपति चुनाव के ये दोनों ही मतदाता कांग्रेस के लिए ही अपनी अलग-अलग जिम्मेदारी को अंजाम देने में व्यस्त थे। प्रदेश में कांग्रेस के सभी 11 विधायक राष्ट्रपति पद की प्रत्याशी मीरा कुमार के बीती 25 जून को नामांकन के दौरान प्रस्तावक बन चुके हैं।

ऐसे में अब दोनों ही निर्दलीय विधायकों का संबंध कांग्रेस से प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से रहा है। इसलिए मीरा कुमार के साथ इस बार सिर्फ कांग्रेस के विधायक रहेंगे। यही नहीं, ये सभी विधायक दिल्ली जाकर उनके प्रस्ताव बन चुके हैं। इसलिए उनके साथ होने को लेकर कोई शंका नहीं है। जब से कांग्रेस 2017 मार्च में हुए विधानसभा चुनाव में हारी है तब से कांग्रेस ने कोई भी कोशिश नहीं की कि पार्टी सत्ता पक्ष पर राजनीतिक बढ़त बनाए।

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ऐसे में यह साफ़ पता चल रहा है कि जिस तरह से कांग्रेस को तैयारी करनी चाहिए थी वैसा कुछ भी नहीं हुआ। यहां तक तो अब खुद कांग्रेस के विधायक व प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह तक ने कह दिया कि अगर कांग्रेस ने समय रहते निर्दलीय विधायकों का समर्थन मांगा होता तो वो दोनों कतई भाजपा सरकार के साथ न जाते लेकिन अफसोस कांग्रेस ऐसा करने में नाकामयाब रही।

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