नीति आयोग ने बताई सरकारी व्यय की परिभाषा, कहा- परिवार और सरकार के बजट में तुलना करना भ्रामक

नई दिल्ली| नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने रविवार को सरकारी व्यय की नई परिभाषा गढ़ने की आवश्यकता बताई और कहा कि परिवार के बजट और देश के बजट के बीच तुलना भ्रामक है। कुमार ने भारत को यूरोप से मिली उस आर्थिक रूढ़िवादिता की आलोचना की जिसमें बजट संतुलन के लिए राजकोषीय घाटों में कटौती की व्यवस्था है।

भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के सालाना सत्र-2018 के दौरान कुमार ने बताया कि नीति आयोग (पूर्व में योजना आयोग) इस समय सार्वजनिक व्यय की क्षमता बढ़ाने के लिए सभी बजट मदों के लिए निष्पादन व परिणाम आधारित मानदंडों की रूपरेखा तैयार करने की दिशा में काम कर रहा है।

‘फिस्कल कोननड्रम यानी राजकोषीय संकट’ सत्र के दौरान राजीव कुमार ने कहा कि मेरा मानना है कि समष्टिगत नीति प्रतिचक्रीय (काउंटर-साइक्लिकल) होनी चाहिए। जब निजी निवेश कमजोर हो नौकरियों की जरूरत हो तब सरकार को हस्तक्षेप (निवेश के साथ) करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि परिवार के साथ सरकार के बजट की तुलना करना बिल्कुल बकवास है, जिसका चलन (पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री) मार्गरेट थैचर के समय में शुरू हुआ।

उन्होंने कहा कि हमें देश की वित्तीय स्थिति के बारे में पूर्ण रूपेण व निकाय समेत सरकार के सभी स्तरों पर विचार करने की जरूरत है। हालांकि, राजीव कुमार ने कहा कि बेहतर राजकोषीय संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण है। सरकार को लोकलुभावना उपायों में शामिल नहीं रहना चाहिए।

नीति आयोग के उपाध्यक्ष ने कहा कि वित्तीय लोकप्रियता का कोई तुक नहीं है। राजनेताओं और सरकारों को लोकलुभावन उपायों से रोकने के लिए एफआरबीएम (राजकोषीय दायित्व व बजट प्रबंधन) अधिनियम 2003 लाया गया।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से अवकाशप्राप्त अर्थशास्त्र के प्रोफेसर दीपक नैयर ने बताया कि भारत में मौजूदा निवेश सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का छह फीसदी है और वर्तमान निजी निवेश कुछ साल पहले के मुकाबले सुस्त है। उन्होंने कहा कि राज्यों का वित्तीय प्रसार सीमित है क्योंकि उन्हें उधारी लेने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक की अनुमति की आवश्कता होती है।

राजीव कुमार ने उद्योग से खराब राजकोषीय घाटे के विरोध में सक्रिय होने की अपील की। उन्होंने कहा, “मैं उद्योग को राजकोषीय नाकामयाबी के खिलाफ आवाज उठाते नहीं देखता हूं।”

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