‘ये भगवान’ तो इंसान कहलाने के लायक नहीं

doctor-bannerकानपुर। एक ही परिवार के तीन लोगों की हादसे में मौत का दर्द समेटे पीड़ित जब हैलट अस्पताल पहुंचे तो उन्हें उन भगवानों से पाला पड़ा जो सही मायने में इंसान भी नहीं बन सके हैं। घायल का इलाज जल्दी करने की बात कहने की सजा ऐसी मिली कि उनकी पिटाई तो हुई ही बल्कि घायल की भी जान चली गई। एक ही घर में हुई चार मौतों के बाद भी इन भगवानों में कतई इंसानियत नहीं दिखी। पीड़ितों के साथ मारपीट के बाद हड़ताल भी कर दी। जो दूसरे मरीजों के लिए भी घातक हो गई।

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पिटाई करना नई बात नहीं

हैलट के जूनियर डॉक्टरों की मरीज और उनके तीमारदारों की पिटाई करना नई बात नहीं है। यहां रोज कोई न कोई इनकी भगवानियत (कार्यशैली) का शिकार बन पीटा जाता है। एक सप्ताह पहले ही एक महिला की मौत भाई बहन की पिटाई की गई थी। उन्नाव के लेक्चरर और उनकी माँ को भी पीट दिया था।

इलाज बंद करने का हथियार करते है इस्तेमाल

हैलट अस्पताल में जूनियर डॉक्टरों की ही हुकूमत चलती है। गलत सही के मायने से ऊपर उनकी कार्यशैली पहुंच चुकी है। ऐसा नहीं है कि बुधवार को ही ऐसा पहली बार हुआ हो। जरा जरा सी बात पर इनका क्रूर रूप दिखाई दे जाता है। और यदि इनका कारनामा इन्हें भारी पड़ता दिखाई देता है तो फिर इलाज बंद कर हड़ताल कर देते हैं। अस्पताल में भर्ती मरीजों के इलाज का मामला होने के चलते इनकी शर्तों पर मामला रफादफा हो जाता है। प्रशासन के सामने भी कार्यवाही के बजाय हड़ताल खत्म कराकर इलाज शुरू करवाना प्राथमिकता बन जाता है।

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28 फ़रवरी 14 को भी हुआ था बवाल

28 फरवरी 2014 को इन्हीं जूनियर डॉक्टरों की सपा विधायक इरफ़ान सोलंकी से भी विवाद हो गया था। इसके बाद डॉक्टरों ने जमकर बवाल काटा था। तत्कालीन एसएसपी यशस्वी यादव मेडिकल कालेज कैम्पस व हैलट में लाठी चार्ज कराया था। तब भी डॉक्टरों ने हड़ताल कर दी थी। जिसने देशव्यापी रूप ले लिया था।

फिर हैलट प्रशासन ने टेके घुटने

बुधवार को पीड़ित दुखियारों की जमकर पिटाई के बाद हड़ताल पर गए जूनियर डॉक्टरों के सामने हैलट प्रशासन ने एक बार फिर घुटने टेक दिए। हड़ताल खत्म करने के एवज में में उन्होंने 13 मांगे रखी। हड़ताल भी तभी खत्म की जब प्रशासन ने उनकी मांगें मान लीं।

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