Diwali 2020 : दीपोत्सव पर दीपक जलायें, कुम्हारों के जीवन में रौनक लायें

पुश्तैनी पेशा छोड़े राम नरायन प्रजापति, राजाराम प्रजापति ने आप बीती सुनाते हुए कहा कि अब इस धंधे में कुछ बचा नहीं है, इस कारण लोगों ने मजबूरी में काम छोड़ दिया है।

बलरामपुर: प्रकाश पर्व दीपावली पर मिट्टी के दिए बनाकर दूसरों के घरों को रोशन करने वाले कुम्हार बिरादरी के लोगो के जीवन में आजादी के 73 साल बाद भी अंधियारा छाया हुआ है।

आधुनिकता के दौर में कुल्हड़ के बजाय प्लास्टिक के गिलास, मिट्टी के कलश की जगह स्टील और पीतल के कलश के चलन ने कुम्हारों के पुश्तैनी धंधे पर संकट पैदा कर दिया हैं।

73 साल बाद भी कुम्हार जाति विकास से अछूती

हिन्दू समाज में कुम्हार जाति और मुस्लिम मे कसघड बिरादरी के लोगो द्वारा मिट्टी को गूंथ कर चाक के सहारे दिए, खिलौने, वर्तन बनाने की अद्भुत कला उनके घूमते चाक व हाथ से बनकर निकलती है। इन्हीं कसघड और कुम्हार बिरादरी के लोगों द्वारा बनाये गये मिट्टी के दिए जलाकर दीपावली में भले ही लोग अपने घरों को जगमगाते हैं, लेकिन आजादी के 73 साल बीत जाने के बाद भी कुम्हार जाति के लोगों को विकास की एक भी किरण मयस्सर नहीं हो सका है जिसके चलते कसघड बिरादरी के लोग आज भी झुग्गी झोपड़ियों में जीवन बसर करने को मजबूर हैं।

पुश्तैनी पेशा छोड़े राम नरायन प्रजापति, राजाराम प्रजापति ने आप बीती सुनाते हुए कहा कि अब इस धंधे में कुछ बचा नहीं है, इस कारण लोगों ने मजबूरी में काम छोड़ दिया है। हालांकि मिट्टी के बर्तन बनाकर बेचना उनका पुश्तैनी धंधा है।

शहरीकरण से कसघड जाति का गुजर बसर छिन गया

उनके मुताबिक इस धंधे मे पहले परिवार का भरण पोषण कर लेना आसान था लेकिन आधुनिकता के दौर में चाक के सहारे तैयार मिट्टी के बर्तन का प्रचलन काफी घट चुका है। महंगाई के जमाने में लागत के अनुपात में आमदनी काफी कम हो गई है। मोहल्ला गांधी नगर निवासी फिरोज कसघड का कहना है कि समाज में बदलते परिवेश और शहरीकरण से उन जैसे लोगों के गुजर बसर का जरिया छिन गया है।

कंडे, लकड़ी व कोयले की मंहगाई से बर्तन पकाने का बोझ बढ़ा 

बताते हैं कि हम लोगों के पुरखो के दौर में मिट्टी के बर्तन का कारोबार अपने शवाब पर था। अब चाइनीज़ सामानों का चलन बाजार में होने से धंधा फीका पड़ गया है। बर्तनों को बनाने से लेकर उन्हे भट्टियों में पकाने और तैयार बर्तन को रखने उठाने में कई बर्तन टूट कर बेकार हो जाते हैं। पहले तो भट्ठियों में गोबर के कंडे व लकड़ी से आग तैयार की जाती थी मगर अब लकड़ी व कोयले के दामों में बेतहाशा मंहगाई के चलते वर्तन पकाने में मोटी रकम खर्च करना पड़ता है।

दीपावली पर मिट्टी के दिये जलाए, वातावरण भी शुद्ध बनायें : राकेश ‘राजन’

समाजसेवी और पेशे से वकील राकेश श्रीवास्तव ‘राजन’ ने बताया कि बारिश खत्म होने के बाद वातावरण मे तमाम तरह के कीट पतंगे उडते है जिनकी वजह से तमाम तरह की बीमारियां फैलती है। दीपावली पर मिट्टी के दिये जलाए जाने से हानिकारक कीट पतंगे जल जाते है। इसके अलावा तेल से मिट्टी के दिए जलने से वातावरण भी शुद्ध बना रहता है।

आधुनिकता के इस दौर मे जहाँ दीपावली पर्व के मौके पर विभिन्न प्रकार के प्लास्टिक से बने कलात्मक खिलौने और दिए दुकानो मे सज बिकने को तैयार है,वही सडको के किनारे फुटपाथ पर मिट्टी से बने खिलौनो को बेचने के जुगत मे बैठे इन कुम्हारो की तरफ देखना कोई गंवारा नही समझ रहा है।

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