क्या मुस्लिमों की धार्मिक आजादी छीनता है यूनिफार्म सिविल कोड? जाने विरोध की बड़ी वजह!

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट द्वारा पिछले साल तीन तलाक पर दिए ऐतिहासिक फैसले के बाद से ही देश में यूनिफॉर्म सिविल कोड की मांग तेज हो गई है। मुस्लिम महिलाओं और कई राजनीतिक दलों ने भी इस कानून को लागू करने की गुहार लगाई है। वहीं कई दलों और मुस्लिम संगठनों ने इसका कड़ा विरोध किया है। उनका मानना है कि इससे उनकी धार्मिक स्वतंत्रता और अधिकार पर चोट पहुंचेगी। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर यूनिफॉर्म सिविल कोड में ऐसा क्या है जो इस पर इतनी चर्चा हो रही है। क्या यह धार्मिक स्वतंत्रता छीनता है? क्या इसके लागू होने से भारत मुस्लिमों की धार्मिक स्वतंत्रता समाप्त जाएगी? क्या देश के सभी पर्सनल लॉ बोर्ड बंद कर दिये जाएंगे? या फिर इस कानून को लेकर देश में सिर्फ राजनीति हो रही है… आइए जानते हैं इन सवालों के जवाब…!

क्या मुस्लिमों के हक छीनता है यूनिफार्म सिविल कोड?

यूनिफार्म सिवल कोड यानी समान नागरिक संहिता सिर्फ मुसलमानों के लिए नहीं है और न ही ये मुसलमानों को हिन्दू बनाने की साजिश है। इसका धर्म से लेना-देना नहीं है। यूनिफॉर्म सिविल कोड सीधा-सीधा जुड़ा है देश के हर नागरिक के अधिकारों से जुड़ा हुआ है। मार-पीट, जमीन-जायदाद आदि के मुद्दे IPC और CrPC से सुलझाये जाते हैं। शादी-विवाह, तलाक, मां-बाप की जायदाद में हिस्सा हर चीज के लिए कानून है। लेकिन इसमें भी धार्मिक पेंच फंसा है…

दरअसल, भारत में अगल-अगल धर्मों के मसलों को सुलझाने के लिए पर्सनल लॉ बनाया है। इस कानून के तहत शादी, तलाक, परिवार जैसे मामले आते हैं। भारत में अधिकतर निजी कानून धर्म के आधार पर तय किए गए हैं। हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध धर्म हिंदू विधि के अंतर्गत आते हैं, जबकि मुस्लिम और ईसाई के लिए अपने अलग कानून हैं।

मुस्लिमों का कानून शरीअत पर आधारित है, जबकि अन्य धार्मिक समुदायों के कानून भारतीय संसद के संविधान पर आधारित हैं। इससे हिन्दू-मुसलमान या किसी और धर्म को दिक्कत नहीं है। दिक्कत है तो सिर्फ महिलाओं को…। दरअसल, इस्लाम में औरतों की शादी, तलाक और उसके बाद हलाला प्रक्रिया कर फिर से शादी को लेकर बड़े पुराने किस्म के कानून हैं।

आज के ज़माने में इन रुढिवादी कानून को लागू करना औरतों की तौहीन है। जिसके विरोध में देश का एक बड़ा वर्ग लंबे समय से समान नागरिक संहिता को लागू करने की मांग कर रहा है। जिनमें मुस्लिम महिलाएं भी शामिल हैं। हालांकि कई मुस्लिम महिलाएं इसके विरोध में भी हैं।

क्या है यूनिफॉर्म सिविल कोड ?

समान नागरिक संहिता अथवा समान आचार संहिता का अर्थ धर्मनिरपेक्ष (सेक्युलर) कानून होता है जो सभी धर्म के लोगों के लिये समान रूप से लागू होता है। यह कानून देश के समस्त नागरिकों (चाहे वह किसी धर्म या क्षेत्र से संबंधित हों) पर लागू होता है। यह किसी भी धर्म या जाति के सभी निजी कानूनों से ऊपर होता है। विश्व के अधिकतर आधुनिक देशों में ऐसे कानून लागू हैं।

ऐसे में अगर यह कानून भारत में लागू होता है तो मुस्लमानों को भी तीन शादियां करने और पत्नी को महज तीन बार तलाक बोले देने से रिश्ता खत्म कर देने वाली परंपरा खत्म हो जाएगी। इतना ही नहीं महिलाओं का अपने पिता की संपत्ति पर अधिकार और गोद लेने जैसे मामलों में भी एक समान नियम लागू होंगे। जोकि मुस्लिम संगठनों के मुताबिक शरीयत के खिलाफ होगा। इसी कारण इसका विरोध हो रहा है।

क्यों है जरूरी?

  • विभिन्न धर्मों के विभिन्न कानून से न्यायपालिका पर बोझ पड़ता है। कॉमन सिविल कोड आ जाने से इस मुश्किल से निजात मिलेगी और न्यायालयों में वर्षों से लंबित पड़े मामलों के निपटारे जल्द होंगे।
  • सभी के लिए कानून में एकसमानता से एकता को बढ़ावा मिलेगा और इस बात में कोई दो राय नहीं है कि जहां हर नागरिक समान हो, उस देश विकास तेजी से होता है।
  • मुस्लिम महिलाओं की स्थिति बेहतर होगी।
  • भारत की छवि एक धर्मनिरपेक्ष देश की है। ऐसे में कानून और धर्म का एक-दूसरे से कोई लेना-देना नहीं होना चाहिए। सभी लोगों के साथ धर्म से परे जाकर समान व्यवहार होना जरूरी है।
  • हर भारतीय पर एक समान कानून लागू होने से राजनीति में भी बदलाव आएगा या यू कहें कि वोट बैंक और ध्रुवीकरण की राजनीति पर लगाम लगेगी।

इन देशों में लागू है यूनिफॉर्म सिविल कोड

एक तरफ जहां भारत में सभी धर्मों को एक समान कानून के तहत लाने पर बहस जोरों पर है, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान, बांग्लादेश, मलेशिया, तुर्की, इंडोनेशिया, सूडान और इजिप्ट जैसे कई देश इसे लागू कर चुके हैं।

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