कभी मजदूरी की, अब सर्जरी में गोल्ड मेडल…मिलिए डॉ प्रेम शंकर से

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dr prem shanker
लखनऊ के केजीएमयू में गोल्ड मेडल के साथ डॉ प्रेम शंकर

लखनऊ। कोई इंसान कैसे खुद अपने हाथों से अपनी तकदीर लिख सकता है, यह डॉ प्रेम शंकर से सीखा जा सकता है।  वह कभी मजदूरी करते थे। लेकिन उनके सपने और मंजिल कुछ और थी। उन्होंने पेट भरने के लिए मजदूरी करने के साथ-साथ अपने सपनों को पूरा करने का जज्बा नहीं छोड़ा। मेहनत की, दिल लगा कर पढ़ाई की। और देख लीजिये उन्हें सजर्री की सर्वोच्च उपाधि एमसीएच (प्लॉस्टिक सर्जरी) के साथ गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया है।

ख़ुशी से छलक पड़े आंसू

राज्यपाल राम नाईक ने लखनऊ की किंग जोर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी में जब यह सम्मान दिया तो डॉ प्रेम ख़ुशी से रो पड़े। ये आंसू इस बात के थे कि कभी ईंट-गारा, मौरंग-गिट्टी से लोगों के घर, दुकान बनाने वाले हाथ अब जले-कटे अंगों को जोड़कर लोगों को नई जिंदगी दे रहे हैं। वे एसिड अटैक पीड़ितों के नैन-नक्श संवार सकते हैं। आज मेडिकल साइंस ही नहीं जो भी उनकी संघर्ष और कामयाबी की कहानी सुन रहा है उन्हें सलाम कर रहा है।

बेहद गरीबी में गुजरा बचपन

डॉ. प्रेम शंकर लखनऊ के मोहनलालगंज के कल्ली पश्चिम गांव के हैं। परिवार में इतनी गरीबी थी कि भुखमरी के हालत थे। पढ़ाई करने के लिए नाना-नानी के यहाँ रहने लगे। हाईस्कूल प्रथम श्रेणी में पास हुए। पैसे के अभाव में पढ़ाई रुक गई। माता-पिता को कई-कई दिन भूखा रहते देखकर उन्होंने मजदूरी करना शुरू कर दिया। तेलीबाग चौराहे पर मजदूरों की मंडी कहे जाने वाले अड्डे पर खड़े हो गए। बिल्डिंग, घर, दुकान या कोई भी ऐसे ही काम के लिए लोग मजदूरों को ले जाते, प्रेम भी उन्ही मजदूरों में शामिल हो गए। रोजाना मजदूरी से घर का खर्च चलाने लगे। रात में पढाई करते। डॉ. प्रेम शंकर कहते हैं भवन निर्माण में मजदूरी नहीं मिली तो लोनिवि ठेकेदार के पास गए। उसने 30 रुपये दिहाड़ी पर कोलतार गर्म करने का काम दिया। एक साथी का हाथ गर्म कोलतार से झुलस गया। कई बार वे खुद कोलतार से बचे।

तीन साल लगातार मजदूरी करते रहे 

डॉ. प्रेम शंकर 1991 से वर्ष 1994 के बीच तीन साल तक बराबर मजदूरी करते रहे। वह बताते हैं कि मेरे ननिहाल में भी गरीबी थी। उसी गरीबी में मामा ने भी एमबीबीएस किया। उस समय इलाहाबाद में नेत्र सर्जरी में एमएस कर रहे थे। मुझे वहीं भेज दिया। मामा ने हौसला बढ़ाया। उन्होंने ही इंटर प्राइवेट करने और सीपीएमटी में बैठने की सलाह दी। पहले मैंने प्राइवेट इंटरमीडिएट फार्म भरा। पहले साल फेल हो गए। दोबारा मेहनत की तो पास हुए और बायोलॉजी में 100 में से 76 नंबर मिले। केकेवी में बीएससी में एडमिशन लिया। इस दौरान वर्ष 1996 में सीपीएमटी में अच्छी रैंक आई।

फर्स्ट डिवीज़न में एमबीबीएस

कानपुर के गणोश शंकर विद्यार्थी मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस में एडमिशन ले लिया। प्रथम श्रेणी में एमबीबीएस पास हुए। आल इंडिया पीजी टेस्ट में उन्होंने बेहतर प्रदर्शन किया। इलाहाबाद मेडिकल कॉलेज से एमएस की डिग्री हासिल कर ली।उसके बाद डॉ. प्रेमशंकर ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। कानपुर के गणोश शंकर विद्यार्थी मेडिकल कॉलेज में ही सर्जरी विभाग में नौकरी मिली। एमसीएच की ऑल इंडिया परीक्षा में उन्होंने टॉप किया, वह भी सामान्य श्रेणी में। उनकी प्रतिभा को राज्यपाल ने गोल्ड मेडल से सम्मानित किया और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उन्हें डिनर पर बुलाकर बधाई दी।

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