तो इसलिए लंबे हो गए हैं दिन और रातें छोटी

earth2टोरंटो। बात चिंताजनक भी है और जानकारी वाली भी। हमारे ग्रहों के ध्रुवों के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इससे समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है, जिसके कारण धरती के अपनी धुरी पर घूमने की गति धीमी पड़ रही है। धरती के घूर्णन की गति में कमी आने के कारण दिन की लंबाई बढ़ रही है। पृथ्वी पर किसी भी मौसम में दिन अब ज्यादा लंबे हो रहे हैं। रात छोटी होती जा रही है। हाल ही में हुए एक रिसर्च में यह खुलासा हुआ है।

इसलिए पृथ्वी के केंद्र का हो रहा है अध्ययन

कनाडा की अलबर्टा यूनिवर्सिटी में भौतिकी के प्रोफेसर और शोधकर्ता मैथ्यू डंबेरी ने कहा, बीती सदी के दौरान समुद्र के जलस्तर में आए बदलाव को पूरी तरह समझने के लिए हमें पृथ्वी के केंद्र में प्रवाह के गति-विज्ञान को समझने की जरूरत है। वैज्ञानिक समुद्र के जलस्तर में आए बदलावों का अध्ययन कर रहे हैं ताकि वे जलवायु परिवर्तन के भावी नतीजों का पूर्वानुमान लगा सकें। इस सिलसिले में वे पृथ्वी के केंद्र पर भी निगाह डाल रहे हैं।

चंद्रमा भी पृथ्वी की रफ़्तार घटा रहा 

ग्लेशियरों के पिघलने से जमा हुआ पानी न केवल समुद्र के जलस्तर को बढ़ा रहा है, बल्कि यह ध्रुव के द्रव्यमान या भार को भी वहां से भूमध्यरेखा की ओर धकेल रहा है। इस कारण पृथ्वी के घूर्णन की गति धीमी हो रही है। शोधकर्ताओं के अनुसार, इस समझदारी का संबंध पृथ्वी के घूर्णन की गति में बदलाव से जुड़ा हुआ है। चंद्रमा के गुरुत्वीय आकर्षण की भी पृथ्वी के घूर्णन को धीमा करने में भूमिका है।

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जितनी धीमी पृथ्वी उतना लंबा दिन

चाँद किसी लिवर ब्रेक की तरह इसके प्रति काम करता है। हालांकि यह काफी छोटे स्तर पर ही होता है। फिलहाल एक साथ मिलकर ये सारे प्रभाव पृथ्वी के घूर्णन में आ रहे धीमेपन का कारण हैं। डंबेरी ने कहा, पिछले तीन हजार साल से, पृथ्वी के केंद्र की गति में थोड़ी ही तेजी आई है, जबकि पृथ्वी की बाहरी सतह जिस पर हम रहते हैं उसकी गति धीमी हुई है। पृथ्वी के घूर्णन की गति जैसे जैसे धीमी हो रही है, दिन की लंबाई उसी अनुपात में बढ़ रही है। आज से एक सदी बाद हमारे दिन की लंबाई में 1.7 मिलीसेकेंड की बढ़ोतरी हो जाएगी। ’

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ऐसे बनी हमारी पृथ्वी 

हमारी धरती कैसे बनी, वैज्ञानिकों ने इस रहस्य को सुलझाने का दावा किया है। ज्वालामुखीय चट्टानों के अध्ययन से उन्हें इस रहस्य को जानने में मदद मिली है कि साढ़े चार अरब वर्ष पहले पृथ्वी कैसे बनी होगी।

विज्ञान पत्रिका ‘नेचर’ ने इस बारे में यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग समेत अन्य यूरोपीय देशों के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए शोध को प्रकाशित किया है। हमारी धरती कैसे और कब बनी, इसके लिए वैज्ञानिकों ने ज्वालामुखी के लावा के ठंडा होने के बाद बने बेसाल्ट का अध्ययन किया है। उन्होंने इसके जरिये यह पता लगाने की कोशिश की है कि धरती और उसके वातावरण के निर्माण की प्रक्रिया कब और क्या रही होगी।

वैज्ञानिकों ने इस बेसाल्ट यानी मैग्मा (धरती के सतह के नीचे पाई जाने वाली पिघली या अ‌र्द्ध पिघली चट्टानों का मिश्रण) के द्रव को 2000 डिग्री सेल्शियस से भी अधिक तापमान पर गर्म कर परीक्षण किया। उन्होंने इस अध्ययन से पता लगाया कि इन पिघली हुई मैग्मा के कारण कभी धरती के मैंटल (धरती के ऊपरी सतह और बाहरी कोर के बीच की 2900 किमी मोटी परत) में समुद्र जैसी कोई संरचना बनी होगी।

वैज्ञानिकों ने इस सच्चाई को माना है कि धरती का निर्माण साढ़े चार अरब वर्ष पहले ही हुआ होगा। उस समय हमारी धरती का ज्यादातर हिस्सा खौलते हुए लावा जैसा रहा होगा। बाद में जैसे-जैसे लावा ठंडा होता गया, धरती के ऊपरी सतह का निर्माण होता गया। अब वैज्ञानिक यह जानने के उत्सुक हैं कि कैसे पृथ्वी के ऊपरी सतह और अंदरुनी कोर ने आकार लिया और उसके अंदर ज्वालामुखीय गतिविधियां कैसे संचालित होना शुरू हुई।

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