तीज त्यौहारों में मिट्टी के दीयों की हाल के वर्षों में बड़ी है खपत, कुम्हारों के चेहरे पर आई मुस्कान

आधुनिक चकाचौंध में भी मिट्टी के दीये जलाने की परंपरा बरकरार है।

मऊ: दीयों की रोशनी के बिना दिवाली अधूरी है। आधुनिक चकाचौंध में भी मिट्टी के दीये जलाने की परंपरा बरकरार है। पूजा-पाठ से लेकर लोग घरों को सजाने में भी मिट्टी के दीये का इस्तेमाल अधिक करते हैं। ऐसे में कुम्हारों की व्यस्तता बढ़ गई है। आधुनिकता की दौड़ व व्यवसायिक युग में एक तरफ जहां बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल वाले कागज के थैलों तक का पैसा वसूल करने में परहेज नहीं करते हैं।

वही गांव में रहने वाले कुम्हार आज भी घरों तक पहुचाने वाले दियों के साथ बच्चों के लिए मिट्टी के खिलौने ले जाना नहीं भूलते। खास बात यह तमाम कोशिशों के बावजूद बच्चों से खिलौने के पैसे लेना मुनासिब नहीं समझते। इसके साथ ही घरों में दिए जाने वाले दीयों के बदले नगद लेनदेन की अपेक्षा अनाज लेने की परंपरा को कायम रखे हुए हैं।

गौरतलब हो कि पिछले एक दशक से लोककृतियों, परंपराओं, तीज त्यौहार में बड़ी तेजी के साथ आधुनिकता का रंग चढ़ा है। ऐसे में दीपोत्सव का त्योहार दीपावली भी इससे अछूता नहीं रह गया। परंपरागत मिट्टी के दीयों का स्थान चाइनीस झालर बत्तियों ने ले लिया। वही एक दूसरे से मिलने और रीत प्रीत की परंपराओं की जगह लोग अपने में सिमटकर ही रहने लगे। लेकिन ऐसे में हाल के कुछ वर्षों से देश के प्रधानमंत्री और तमाम संगठनों द्वारा मिट्टी के दीयों से दीपावली मनाने की अपील रंग लाती नजर आती है।

इससे एक तरफ जहां अपनी पुरातन संस्कृति से नई पीढ़ी का जुड़ाव होता नजर आएगा वही गांव गिराव में रहने वाले हमारे समाज के विभिन्न समुदायों के भाई बंधुओं को रोजगार भी स्थापित होने लगा। एक आंकड़े के अनुसार पिछले चार-पांच वर्षों में मिट्टी के दीयों की मांग काफी बढ़ गई। लोगों द्वारा पुनः चाइनीस झालर बत्ती के स्थान पर मिट्टी के दीयों से घर सजाने की परंपरा शुरू हो गई।

दीपावली के हफ्तों पूर्व से कुंभार दंपतियों द्वारा लोगों के घरों तक मिट्टी के दीए पहुंचाने का कार्य शुरू हो गया। खास बात यह है कि एक तरफ जहां लोग नगद लेनदेन के साथ ही डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा देते नजर आ रहे हैं वहीं कुम्हार दंपतियों द्वारा आज भी पारंपरिक रूप से नगदी के स्थान पर अनाज की ही मांग की जाती रही।

लोक परंपराओं की बात करें तो पूर्व में दीपावली के समय बच्चों के खिलौने के रूप में मिट्टी के घंटी और मिट्टी के चकिया मुफ्त मिला करते थे जिन्हें कुम्हारिन काकी द्वारा आज भी उपलब्ध कराए जाने की परंपरा कायम रखी गई है। इस संबंध में घरों तक दिया पहुंचाने आई लक्ष्मीना काकी ने कहाकि हाल के कुछ वर्षों से लगातार दीयों की मांग ने हमारे परंपरागत व्यवसाय में संजीवनी का काम किया है। स्थिति यह है कि अब हम बच्चों को लेकर चाक के सहारे दिए बनाने का काम करते हैं।

हालांकि कुम्हहारर गड्ढों से पर्याप्त मात्रा में मिट्टी की उपलब्धता के लिए थोड़ी बहुत दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। शिवपूजन प्रजापति ने कहाकि गांव के घर हमारे लिए खेती के समान थे जहां हम चैत रामनवमी के समय मिट्टी के बर्तन व दीपावली के समय दीए, मूर्ति व मिट्टी के खिलौने देकर अनाजों की वसूली किया करते थे। जिससे हमारे साल भर का खाद्यान्न का काम चल जाता था। ऐसे में दोबारा मिट्टी के दीयों का चलन बढ़ने से हमारा व्यवसाय चल पड़ा है।

मिट्टी के खिलौने बर्तन बनाने वाले हरिद्वार प्रजापति ने कहा कि लॉकडाउन के चलते रामनवमी पर मिट्टी के बर्तनों की आपूर्ति नहीं हो सकी। वहीं साल भर तीज त्यौहार लगभग ना के बराबर होने से मिट्टी के बर्तनों की मांग काफी कम रही है। लेकिन सरकार द्वारा प्लास्टिक पर लगाए गए पूर्ण प्रतिबंध से अब पुनः शादी विवाह के अवसरों पर कुल्हड़ की मांग होने लगी जिससे कुम्हार कलाकारी के दिन फिर से उबरने के आसार नजर आने लगे हैं।

हालाकी मिट्टी की उपलब्धता ना हो सकने से काफी दिक्कत का सामना करना पड़ता है। गांव में कुम्हार कलाकारी के लिए आरक्षित कुम्हार गड्ढों को अतिक्रमण कर लिया गया है। या तो जरूरत के हिसाब से चिकनी मिट्टी की उपलब्धता नहीं हो पाती। जिससे ₹1200 से ₹1500 प्रति ट्राली के हिसाब से चिकनी मिट्टी की खरीद करनी पड़ती है। फिलहाल मिट्टी के बर्तनों व दियों की मांग बढ़ने से परंपरागत व्यवसाय पुनर्जीवित होने लगा है।

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