Exit Poll: इस मामले में नेहरू-इंदिरा को देंगे कड़ी टक्कर PM मोदी?

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एग्जिट पोल अगर Exact पोल ठहरे तो नरेंद्र मोदी इस बार एक नया इतिहास रच सकते हैं. वह जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी के बाद तीसरे ऐसे नेता होंगे, जिनके करिश्माई नेतृत्व में कोई पार्टी लगातार बहुमत से सत्ता हासिल करेगी.

देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस की देश में लगातार तीन बार तो इंदिरा गांधी की अगुवाई में दो बार सरकार बन चुकी है. ऐसे में अगर 2019 का लोकसभा चुनाव मोदी बहुमत से जीतने में सफल रहते हैं तो फिर वह 48 साल बाद इंदिरा गांधी के रिकॉर्ड की बराबरी कर सकते हैं. यहां तुलना किसी नेता के नेतृत्व में एक पार्टी को “लगातार बहुमत” मिलने से है. वैसे देखें तो इंदिरा गांधी के नेतृत्व में तीन बार कांग्रेस की बहुमत से सरकार बन चुकी है. मगर बीच में एक बार हार के कारण लगातार बहुमत पाने का सिलसिला टूट गया था.

इतिहास में जाएं तो आजाद भारत में 1952 में पहला लोकसभा चुनाव हुआ था. पंडित जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में लड़ते हुए कांग्रेस ने इस चुनाव में 44.99 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 364 सीटें जीतीं थीं. 1957 के दूसरे लोकसभा चुनाव में फिर नेहरू के करिश्माई नेतृत्व में कांग्रेस को 47.78 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 371 सीटें मिलीं. 1962 के लोकसभा चुनाव में नेहरू ने बहुमत की हैट्रिक लगाई. इस बार 44.72 प्रतिशत वोट शेयर के साथ कांग्रेस को 361 सीटें मिलीं. इसके बाद जवाहर लाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री जैसे नेताओं के निधन और फिर पार्टी के अंदरखाने नेतृत्व को लेकर इंदिरा गांधी और मोरारजी देसाई के बीच मचे घमासान के कारण कांग्रेस की हालत खराब होने लगी.

बहरहाल, कांग्रेस ने 1967 का लोकसभा चुनाव इंदिरा गांधी के नेतृत्व में लड़ा. इस चौथे लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी अपने नेतृत्व में कांग्रेस को बहुमत दिलाने में सफल रहीं. कांग्रेस को हालांकि पूर्व के चुनावों की तुलना में कम 284 सीटें मिलीं. फिर भी जिस तरीके की कांग्रेस के अंदर परिस्थितियां थीं, उससे इन नतीजों को भी सकारात्मक लिया गया. इसके बाद 1971 में हुए पांचवें लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी ने अपने नेतृत्व में कांग्रेस को 352 सीटें दिलाईं. इस लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 43 प्रतिशत वोट शेयर मिले.

पहली बार कांग्रेस सत्ता से बाहर

1977 में छठीं बार लोकसभा के चुनाव हुए. आजाद भारत के इतिहास में यह पहला मौका था, जब कांग्रेस को सत्ता से बाहर होना पड़ा. कांग्रेस की इंदिरा सरकार को आपातकाल और अपने खिलाफ हुए जनआंदोलनों की कीमत चुकानी पड़ी. इस चुनाव में जहां जनता पार्टी गठबंधन को 298 तो कांग्रेस को 153 सीटें मिलीं. जनता पार्टी की तरफ से मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने. हालांकि मतभेदों के चलते सरकार चल नहीं सकी. 1980 में सातवीं लोकसभा के चुनाव में फिर इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को 353 सीटें मिलीं. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जनता की अभूतपूर्व सहानुभूति कांग्रेस और राजीव गांधी के पक्ष में देखने को मिली. 1984 में हुए आठवीं लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को रिकॉर्ड 414 लोकसभा सीटें मिलीं.

सफलता बरकरार नहीं रख पाए राजीव

नौवीं लोकसभा चुनाव(1989) में राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा. कांग्रेस को महज 197 सीटें आईं, वहीं वीपी सिंह के नेतृत्व में नेशनल फ्रंट को 143 और बीजेपी को 85 सीटें मिलीं. इस बार वीपी सिंह पीएम बने. दरअसल, बोफोर्स, लिट्टे आदि से जुड़े विवादों के चलते राजीव गांधी की साख पर असर पड़ा था. इसे कांग्रेस की हार के प्रमुख कारणों में गिना गया. 10वीं लोकसभा चुनाव(1991) में कांग्रेस को 226, बीजेपी को 119 सीटें मिलीं. 1996 में बीजेपी 161 सीटें जीतने में सफल रही. 1999 के लोकसभा चुनाव में एनडीए को 298 सीट मिली. 2004 में कांग्रेस को 145. वहीं 2009 में कांग्रेस को 206 और बीजेपी को 116 सीटें मिलीं. 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने 282 सीटें जीतीं और एनडीए 300 के पार पहुंच गया, जबकि कांग्रेस को सिर्फ 44 सीटों से संतोष करना पड़ा.

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