ठेले पर बैठकर पंजाब से 1100 किमी दूर श्रावस्ती पहुंचा 14 लोगों का परिवार

कोरोना वायरस के प्रसार को कम करने के लिए लगाए गए लॉकडाउन के चलते प्रवासी मजदूरों को कई परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. दरअसल, दूसरे राज्यों से आए मजदूरों का लॉकडाउन के बावजूद घर जाने का सिलसिला जारी है. ऐसी कई तस्वीरें सामने आईं, जहां भूखे-प्यासे बच्चों और महिलाओं के साथ मजदूर अपने घर की ओर जाते दिखे. मासूम बच्चों के साथ कई मजदूर परिवारों का काफिला मीलों पैदल सफर तय करता नजर आया.

ऐसी ही एक तस्वीर उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले से सामने आई है. जहां 14 लोगों के परिवार का एक जत्था ठेले के सहारे मासूम बच्चों को साथ लेकर मीलों का सफर तय कर पंजाब से श्रावस्ती पहुंचा. जब मजदूर परिवार श्रावस्ती पहुंचा तो आसपास के लोग इनके जज़्बे को देखकर हैरान रह गए. मजदूर अपने परिवार को ठेले पर लेकर पहुंचा था. लोगों का कहना था कि कंधे पर और ठेले पर मासूमों को लेकर चलना इनकी मजबूरी थी क्योंकि घर पहुंचना भी जरूरी था.

पंजाब से करीब 1100 किलोमीटर का सफर तय करने के बाद जब 14 लोगों का एक जत्था मासूम बच्चों को ठेले पर बैठाकर श्रावस्ती जनपद पहुंचा तो आसपास के लोग देखकर हैरान रह गए. मजदूर ने एक ठेले पर अपने बच्चों को बैठा रखा था साथ ही ठेले पर सामान भी रखा हुआ था. उसका बाकी परिवार पैदल चल रहा था. उनमें से पैदल चल रहे एक युवक ने अपने कंधे पर एक मासूम बच्चे को बैठाया हुआ था. उनके चेहरे को देख कर लग रहा था कि ये मासूम बच्चे कई दिनों से भूखे हैं.

पंजाब से ठेला लेकर 14 लोगों के परिवार संग चला युवक जब श्रावस्ती पहुंचा तो उसने अपना दर्द बयां करते हुए आज तक को बताया कि पंजाब से पैदल चलकर आए हैं. कहीं-कहीं साधन मिल जाता था तो कहीं-कहीं नहीं मिलता था. हमारा महिलाओं, बच्चों को मिलाकर कुल 14 लोगों का परिवार है. जिसमें 7 मासूम बच्चे भी साथ में हैं. हम सभी को झरियकडीह गांव जाना है. हमारे पास पैदल निकलने  के अलावा कोई रास्ता नहीं था.

उनकी स्थिति को देखकर स्थानीय लोगों के मन में नाराजगी थी कि आखिर इनकी मदद करने के लिये कोई भी क्यों तैयार नहीं हुआ. उनका कहना था कि महिलाओं और मासूम बच्चों को साथ लेकर चलना कोई आसान काम नहीं होता है. मजदूर का कहना है कि गैर प्रदेश में लॉकडाउन के चलते कोई काम भी नहीं था. घर वापस आना हमारी मजबूरी बन गई थी. वापस आने के अलावा हमारे पास कोई रास्ता नहीं था.

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