#Special2015: यूपी के ये 10 किस्से आप भूल नहीं पाएंगे

लखनऊ। साल 2015 अलविदा होने वाला है और नए साल यानी 2016 के आगाज की तैयारियां जोरों पर हैं। यह वर्ष उत्तर प्रदेश के लिए कई मायनों काफी अहम रहा तो कुछ घटनाओं व व्यक्तियों ने काफी सुर्खियां बटोरीं। प्रदेश में हुए दादरी कांड की गूंज संसद तक सुनाई दी तो प्रख्यात साहित्यकार रामदरश मिश्र को साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजे जाने की घोषणा की गई। उत्तर प्रदेश लोकसेवा आयोग (यूपीपीएससी) से विवादों की विदाई हुई तो तो जीवटता की धनी अरुणिमा सिन्हा को मिले ‘पद्मश्री’ सम्मान ने ‘हौसलों की उड़ान’ की बात को सच साबित किया।

1- कभी नरम-कभी गरम हुए राज्यपाल

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वर्ष 2015 में राज्यपाल भी कभी प्यार तो कभी तकरार की मुद्रा में नजर आए। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से प्यार तो उनकी सरकार के फैसलों पर तेवरों की धार से वार को लेकर राज्यपाल राम नाईक चर्चा में रहे। प्रोटोकॉल व परंपरा से निकलकर मुख्यमंत्री को जन्मदिन की बधाई देने उनके आवास पहुंचने वाले नाईक ने विधान परिषद में मनोनीत होने वाले नौ सदस्यों की सूची को सवालों में ऐसा उलझाया कि बमुश्किल चार नामों को ही सरकार मंजूरी दिला पाई।

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कई विधेयकों को रोककर, ‘हिंदुस्तान के खून में भगवान राम का डीएनए है’ जैसा बयान तो कभी यूपी में खराब कानून-व्यवस्था और उसमें सुधार की सलाह देकर राज्यपाल खबरों में रहे। लोकायुक्त की नियुक्ति के लिए सरकार की सिफारिश पर आपत्तियों से भी राज्यपाल चर्चा में रहे।

2- आजम खां कभी रुठे तो कभी मनाए गए

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उत्तर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री आजम खां वर्ष 2015 में चर्चाओं में छाए रहे। कभी रूठना तो तो कभी मान जाना, कभी सरकार के बचाव में दीवार की तरह आगे खड़े होकर तो कभी खुद निशाना साधकर वह चर्चा में रहे। राजभवन व राज्यपाल भी उनके निशाने पर आए बिना नहीं रहे। मुलायम को अपना महबूब नेता बताने वाले आजम मंत्रिपरिषद विस्तार में ‘अपनों की कम पूछ’ पर ऐसा रूठे कि उनके इस्तीफा तक दे देने की चर्चा पूरे सूबे में सुर्खियां बटोर ले गईं।ग्रेटर नोएड में दादरी के बिसाहड़ा कांड पर संयुक्त राष्ट्र संघ को पत्र लिखने का उनका ऐलान भी खबरों में छाया रहा। अमर सिंह की सपा में बढ़ती तवज्जो पर मुख्यमंत्री आवास पर रोजा इफ्तार में उनका गुपचुप से आना और वापस लौट जाना रोजा इफ्तार से ज्यादा महत्वपूर्ण खबर बन गई।

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साल जाते-जाते यह कहकर कि वह प्रधानमंत्री बने तो नेताजी को आपत्ति नहीं होगी, खुद को सपा के भीतर व बाहर फिर चर्चा में ला दिया। अमर सिंह को लेकर ‘तूफान के साथ कूड़ा-करकट भी जाता है’ वाले बयान से भी आजम चर्चा में रहे।

3- न्यायाधीश वीरेंद्र सिंह का अधूरा राजतिलक

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साल 2015 की जब भी चर्चा होगी तो पूर्व न्यायाधीश वीरेंद्र सिंह का अधूरा राजतिलक भी याद आएगा। अपनी 39 साल के करियर में न्यायमूर्ति वीरेंद्र सिंह उतनी चर्चा में नहीं रहे होंगे, जितनी साल के अंत में रहे।
सर्वोच्च न्यायालय ने संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल खड़े करते हुए उनकी लोकायुक्त पद पर नियुक्ति कर दी। देश में ऐसा पहली बार हुआ। पर, महज तीन दिनों में ऐसा उलट-फेर हुआ कि शीर्ष अदालत के ही निर्देश पर न्यायमूर्ति वीरेंद्र का सिंह राजतिलक नए साल तक के लिए टल गया।

4- रवींद्र सिंह यादव के हिस्से में सिर्फ विवाद

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पूर्व न्यायाधीश रवींद्र सिंह लोकायुक्त तो नहीं बन पाए, लेकिन विवादों में आकर चर्चाओं में जरूर बने रहे। लोकायुक्त की कुर्सी पर उनकी नियुक्ति की फाइल सरकार और राज्यपाल के बीच कई बार घूमी।

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सरकार ने हर बार नए तर्को से उनके चयन को जायज ठहराने की कोशिश की, तो राज्यपाल राम नाईक ने कभी सूबे के मुख्य न्यायाधीश के सहमत न होने का हवाला देकर तो कभी किसी और तथ्य से सरकार के तर्को को खारिज कर दिया।

5- चर्चा में रहे विख्यात शायर मुनव्वर राणा

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2014 में उर्दू अकादमी की अध्यक्षी छोड़कर चर्चा में रहे उर्दू साहित्य की दुनिया के जाने-माने चेहरे मुनव्वर राणा इस साल साहित्य अकादमी सम्मान वापसी के तौर-तरीकों को लेकर खबरों में बने रहे। दादरी के बिसाहड़ा गांव की घटना को लेकर साहित्यकारों के सम्मान वापसी अभियान को लेकर पहले तो उन्होंने कहा, “जिन्हें अपनी कलम पर भरोसा नहीं, वह सम्मान वापस कर रहे हैं। पर, कुछ ही दिन बाद दिल्ली में एक मुशायरे में पहुंचे राणा अचानक एक न्यूज चैनल के दफ्तर में सम्मान वापसी का ऐलान कर दिया। उनको लेकर चर्चा यहीं नहीं रुकी। बाद में उन्होंने यह कहकर कि “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात में अगर मेरी बात मान ली गई तो सम्मान वापस ले लूंगा” कहकर फिर सुर्खियों में आ गए।

6- पर्वतारोहण कर चुकीं अरुणिमा सिन्हा को नवाजा गया

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वर्ष 2011 में ट्रेन से फेंके जाने की घटना में एक पैर गंवाने के बाद पर्वतारोहण कर चुकीं अरुणिमा सिन्हा को बड़े नागरिक सम्मान ‘पद्मश्री’ से नवाजा गया। प्रधानमंत्री मोदी ने न सिर्फ अरुणिमा को सम्मानित किया, बल्कि उनकी बहादुरी का उदाहरण देते हुए लड़कियों को हौसले से काम लेने की सलाह भी दी। अपनी जीवनी ‘बॉर्न अगेन इन द माउंटेन’ से भी अरुणिमा चर्चा में आईं। उतरते साल में अरुणिमा ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और देश के प्रमुख उद्योगपति रतन टाटा के हाथों उन्नाव में शहीद चंद्रशेखर आजाद विकलांग खेल अकादमी एवं प्रोस्थेटिक लिंब रिसर्च सेंटर का शिलान्यास कराकर यह साबित कर दिया कि एक पैर की इस लड़की की एवरेस्ट फतह की कहानी महज संयोग नहीं, बल्कि साहस का ही नतीजा थी।

7- डॉ. रामदरश मिश्र  को सम्मान

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साल के अंतिम दौर में आखिरकार 91 वर्षीय प्रतिष्ठित साहित्यकार गोरखपुर के छोटे से गांव डुमरी के डॉ. रामदरश मिश्र को भी सुर्खियों में ला दिया। कविता, गजल, उपन्यास, संस्मरण, कहानी, ललित निबंध और आत्मकथाएं जैसी साहित्य के संसार की हर विधा में सिद्धहस्त डॉ. मिश्र को साहित्य अकादमी सम्मान की घोषणा हुई। जिस दौर में पूरे देश में सहिष्णुता-असहिष्णुता का संघर्ष समाचार बन रहा हो, उसमें डा. मिश्र का साहित्य अकादमी सम्मान स्वीकारना तो चर्चा में रहेगा ही। उन्होंने कहा कि साहित्य अकादमी जैसा संस्थान विवादों के लिए नही बना है। यह एक ऐसा आंगन है, जहां सभी भाषाएं एक साथ उठती बैठती हैं। इसका सभी को सम्मान करना चाहिए।

8- अनिल यादव रहे सुर्खियों में

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सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर उप्र लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष अनिल यादव की आखिरकर आयोग से विदाई हो ही गई। उनके कार्यकाल में आयोग की साख पर पीसीएस परीक्षा का प्रश्नपत्र आउट होने का धब्बा लगा। विवादित कार्यशैली को लेकर ही सही, सड़कों से सदन और न्यायालय तक अनिल यादव चर्चा में बने रहे। विवाद तो उनके आयोग का अध्यक्ष बनने के साथ 2013 से ही शुरू हो गए थे। पर, इसे और तूल मिला उनकी डिग्री फर्जी होने के आरोप से। उनके अध्यक्ष रहते कोई ऐसा परीक्षा परिणाम नहीं रहा, जिस पर विवाद और हंगामा न हुआ हो।

9- अमर सिंह रहे सुर्खियों में

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साल 2015 यूपी सपा में अमर सिंह की वापसी के लिए भी याद किया जाता है। हालांकि पार्टी में उनका सीधा दखल तो नहीं हो पाया लेकिन सपा मुखिया मुलायम सिंह ने सिर्फ उनके लिए अपना बर्थ -डे अलग से मनाया। अमर की वापसी पर अगर कोई नाराज हुआ तो वो थे आजम खां ।

10- साल जाते- जाते डीजीपी जगमोहन यादव सुर्खियों में

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डीजीपी जगमोहन यादव ने अपने दो साल की नियुक्ति बढ़ाने के लिए हाइकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। यह पहला मौका था जब यूपी की अफसर शाही में कोई अपनी नियुक्ति सीमा बढ़ाने के लिए इस तरह कोर्ट पहुंच गया। फिरहाल कोर्ट ने उनकी एक ना सुनी।

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