अयोध्या: मजहबी शियासत में दम तोडती आस्था, सच के स्वरुप में गुमराह होते भक्त,आखिर शियासत कब तक?

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आजकल भारत में तापमान न केवल मौसम की गर्मी से बल्कि चुनावी हवा की वजह से भी बढ़ा हुआ है।भारत में चुनाव गर्मियों में शायद इसलिये होते है ताकि सियासत की गर्माहट और मौसम की गर्मी का तालमेल बना रहे | भारतीय राजनीति का मिज़ाज ही कुछ ऐसा है कि जब तक राजनीति की दाल में धर्म का तड़का न लगे चुनाव की सियासी रोटियाँ तोड़ने में मज़ा नहीं आता और भारत की इस मजहबी सियासत का सबसे बड़ा मुद्दा है रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद।

 

संभवतः ये पहला मुद्दा होगा जिसमें न्याय से अधिक समझौते को महत्व दिया जाता रहा है। हर चुनाव में इस मुद्दे को इतना प्रासंगिक बना दिया जाता है कि आम आदमी समझे कि इस बार तो आर या पार होकर ही रहेगा हालांकि ये सपना फिलहाल सपना ही बना हुआ है। ऐसा नहीं है कि ये मुद्दा केवल आजकल की राजनीति के हाथों का खिलौना बना हुआ है और किसी वर्गविशेष के वोट के खातिर इसके पक्ष और विपक्ष में बातें रखी जा रही हैं।

इस मंदिर मस्जिद का विवाद तबसे चला आ रहा है जबसे बाबरी मस्जिद का निर्माण हुआ।भारतीय इतिहास के अनुसार,बाबर के सेनापति मीर बाक़ी ने ,जोकि अवध प्रांत का प्रभारी भी था, अपने राजा बाबर के आदेश पर एक हिंदू मंदिर को तुड़वाकर बाबरी मस्जिद का निर्माण करवाया था।

इतिहास के अनुसार, 1940 तक यह स्थल “जन्मस्थान की मस्जिद” के नाम से जाना जाता था।जो स्पष्ट रूप से यह संकेत देता है कि मस्जिद की जगह एक हिंदू मंदिर हुआ करता था जिसे राम के जन्मस्थान पर ही बनाया गया था।मस्जिद के साथ ही भारत के दो प्रमुख संप्रदायों में धार्मिक विद्वेष की भावना घर कर गयी थी।यह मस्जिद भव्य जरूर थी लेकिन इबादत के लिये इसका प्रयोग कम ही किया जाता था।फिर भी कहीं न कहीं हिंदुओं की धार्मिक भावना आहत हुई थी |

जिसके लिये पहली लड़ाई सन् 1853 में शुरू हुई। सन्1853 में अवध की कमान नवाब वाजिद अली शाह के हाथों में थी उसी समय निर्मोही नामक हिंदू संप्रदाय जिसे अब निर्मोही अखाड़ा नाम से जाना जाता है, ने प्रथम बार मस्जिद के स्थान पर मंदिर बनाने की माँग रखी। हालांकि इस माँग को सिरे से खारिज कर दिया गया।

 

फ़ैजाबाद गजट 1905 के अनुसार, 1855 तक हिंदू मुसलमान अपनी अपनी पूजा या इबादत एक साथ ही करते थे किंतु 1857 की सैनिक क्रांति के बाद मस्जिद के चबूतरे पर एक दीवार बना दी गयी और हिंदूओं को वहाँ प्रवेश नहीं करने दिया गया और उन्हें उस स्थल पर पूजा करने और चढ़ावा देने से भी वंचित कर दिया गया।

इसके बाद सन्1883 में मंदिर निर्माण की माँग फिर दोहरायी गयी लेकिन तत्कालीन प्रशासन ने न सिर्फ 1883 में मंदिर निर्माण रोका बल्कि 19 जनवरी 1885 को विवादित स्थल को निषिद्ध घोषित कर दिया।लेकिन मामला यहीं शांत नहीं हुआ। इसके बाद ही महंत रघुवीरदास इस मामले को फैजाबाद न्यायालय के दरवाजे तक ले आये।इनके साथ ही पंडित हरिकिशन ने 17फीट×21फीट के चबूतरे पर राम मंदिर बनाने की याचिका दायर की किंतु ये याचिकायें खारिज कर दी गयीं। इसी साल 17 मार्च और 25मई 1886 को भी याचिकायें डाली गयीं और नकार दी गयीं।मंदिर निर्माण की पहली लड़ाई यहीं खत्म हो गयी।

अब तक की लड़ाई पूर्णतः धार्मिक थी और इसका केन्द्र विशुद्ध आस्था की भावना थी किंतु इसके बाद से जो लड़ाई लड़ी गयी या यूं कहें कि आजतक लड़ी जा रही है वो धर्म से शुरू तो होती है लेकिन रूख राजनीतिक हो जाता है,ये भी दलगत याजन ति का एक हिस्सा बन जाती है और दक्षिणपंथियों के लिये फायदे की गारंटी।

1886 के बाद लगभग 63 वर्षों के पश्चात् दूसरा आंदोलन सन् 1949 में 22 दिसम्बर की रात को शुरू होता है जब आधी रात को सुरक्षा घेरे से बचकर विवादित स्थल पर राम व सीता की मूर्तियाँ रख दी जाती हैं और हजारों की संख्या में साधु संत मंदिर के अंदर प्रवेश करने लगते हैं। इसके बाद अगली सुबह ही FIR रजिस्टर कर दी गयी । तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू के निर्देश पर उत्तरप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री पं. गोविंदबल्लभ पंत ने हिंदू देवताओं की मूर्तियाँ हटा लेने का आदेश दिया।इस घटना के बाद माहौल काफी तनावपूर्ण हो गया और प्रशासन को विवादित परिसर में ताला लगा देना पड़ा ।क्योंकि किसी का भी पक्ष लेने से हालात और नाजुक बन सकते थे, बात सांप्रदायिक हिंसा तक आ सकती थी क्योंकि मामला दो धर्मों की आस्था से जुड़ा माना जा रहा था।

सन् 1984 में विश्व हिंदू परिषद् ने ताला खुलवाने की माँग को लेकर देशव्यापी आंदोलन किया और इसी का परिणाम रहा कि सन् 1985 में कांग्रेस की राजीव गांधी सरकार ने ताला खोलने के आदेश दे दिये।

नवम्बर 1989 में आम चुनावों से पहले विश्व हिंदू परिषद् ने विवाद वाली भूमि पर शिलान्यास करने की अनुमति ली और कारसेवकों के साथ अयोध्या कूच किया।इस समय उत्तरप्रदेश में मुलायम सिंह यादव का शासन था। अयोध्या का माहौल काफी गर्म था । बाबरी मस्जिद के 1.5 किलोमीटर के दायरे में बैरिकेडिंग कर दी गयी थी, कर्फ्यू लगा था और अयोध्या के चप्पे चप्पे पर पुलिस बल तैनात कर दिये गये थे । कारसेवक अयोध्या पहुँच चुके थे और अब वे बाबरी की ओर बढ़े जा रहे थे । हनुमानगढ़ी के पास उन्हें रोक दिया गया और 30 अक्टूबर 1990 को 5 कारसेवकों को पुलिस ने गोली मार दी।

इसके बाद से अयोध्या विवाद ने अत्यंत उग्र रूप धारण कर लिया और अब हजारों की संख्या में कारसेवक अयोध्या  पहुँचने लगे। इनका नेतृत्व विश्व हिंदू परिषद् के अशोक सिंघल, उमा भारती और स्वामी वामदेवी कर रहे थे। 11लाख कारसेवकों की भीड़ हनुमानगढ़ी पहुँचा जोकि बाबरी से काफी नजदीक स्थित था। भीड़ प्रशासन के हाथों से बेकाबू होती जा रही थी और हालात न संभलते देख सरकार ने भीड़ पर गोली चलाने के आदेश दे दिये ।

2 नवम्बर की इस गोलीकांड में 18 लोग मरे जिनका अंतिम संस्कार 4 नवम्बर को किया गया। इस गोलीकांड के बाद अयोध्या विवाद अपने चरमोत्कर्ष पर आ गया और इसी कांड के कारण अगले चुनाव में मुलायम सिंह यादव हार गये और जनता ने कल्याण सिंह पर अपना भरोसा जताया।इस गोलीकांड के 2 साल बाद ही बाबरी मस्जिद को ढहा दिया गया।

6 दिसम्बर 1992 को आडवाणी की दक्षिण से शुरू हुई रथयात्रा अयोध्या पहुँची जहाँ कारसेवकों की भीड़ पहले से ही मौजूद थी।जाँच कमेटी के हिसाब से ये एक प्रीप्लांड घटना थी। विहिप के नेताओं ने भड़काऊ भाषण दिये और लाखों कारसेवक 2 दिसम्बर की दोपहर में बाबरी मस्जिद को तोड़ने लगे और “एक धक्का और दो, बाबरी को तोड़ दो” के गगनभेदी नारे आसमान में गूँजने लगे। 17 से 18 मिनट के अंदर ही बाबरी को तहस नहस कर दिया गया।

इसके बाद तकरीबन 65 नेताओं को जाँच कमेटी ने अपने 2009 की रिपोर्ट में दोषी ठहराया जिसमें भाजपा के क ई दिग्गज नेता भी शामिल थे। 30 सितम्बर 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने टाइटल सूट की सुनवाई में 2.77 एकड़ की विवादीत भूमि को तीन बराबर हिस्सों में बाँटकर इसके तीन दावेदारों, रामलला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा तथा सुन्नी वक्फ़ बोर्ड को देने का फैसला दिया जिसपर सुप्रीम कोर्ट ने 9 मई 2011 को रोक लगा दी। मामले की अगली सुनवाई म ई 2019 तक लंबित है।

फिलहाल सभी राजनैतिक दल अपने अपने फायदे के हिसाब से मंदिर या मस्जिद का पक्ष लेकर अपनी दाल गलाने के चक्कर में हैं। भले ही इन आदोलनों के लिये दक्षिणपंथी बदनाम हों लेकिन बाकी पार्टियाँ भी पीछे नहीं है और कुछ तो ऐसी भु है जो अपना रूख साफ.न करते हुये दोनों ही पक्षों को अपने पक्ष में कर लेना चाहती हैं ।

विकास का नारा बेशक सबसे महत्वपूर्ण है लेकिन धार्मिक समीकरण भी राजनीति के बिसात पर शह मात देने की कुव्वत रखते हैं और 1990, 1999 और 2014 में भाजपा के इसी हिंदुत्व के एजेंडे राम मंदिर निर्माण के वादे ने सत्तासीन करने में बड़ी भूमिका निभाई है। भले ही ये बात कोर्ट के फैसले के हवाले से कही गयी हों लेकिन इस हिंदूवादी छवि का पूरा पूरा फायदा भाजपा को मिला है वहीं अल्पसंख्यकों के भाजपा से दूर होने से ये मौका विपक्षी भी हाथ से जाने नहीं देना चाहते ,जिसका परिणाम आये दिन मुस्लिम तुष्टीकरण की बयानबाजियाँ हैं जिससे धार्मिक आधार पर जनता के टुकडे़ करके सत्ता की मलाई खाई जा सके।

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