पहली बार Varanasi के आम, काले चावल, लौकी ने Global Markets में अपनी जगह बनाई

पहली बार वाराणसी के आम, काले चावल, लौकी ने COVID-19 के बावजूद वैश्विक बाजारों में अपनी जगह बनाई है

वाराणसी: पहली बार वाराणसी (Varanasi) के आम, काले चावल, लौकी (Mango, Black Rice) ने COVID-19 के बावजूद वैश्विक बाजारों में अपनी जगह बनाई है। वैसे तो बनारस आज भी बहुत-सी चीजों के लिए मशहूर है, पर जिस चीज के लिए वह सारे उत्तर भारत में प्रसिद्ध है, वह है बनारस का लंगड़ा आम, जिसे देखते ही लोगों के मुंह में पानी आ जाता है और वे उसे किसी भी कीमत पर खरीदने को तैयार हो जाते हैं। गर्मी शुरू होते ही जैसे आम की मीठी खूशबू हवाओं में बहने लगती है। लोगों को आम खाने का मन करने लगता है।

 

निर्यात की व्यवस्था

वाराणसी से अन्य देशों को सीधे हरी सब्जी, आम और काला चावल के निर्यात की व्यवस्था साल 2020 में शुरू की गई थी। मई 2020 में तीन मीट्रिक टन बनारसी आम, लंगड़ा आम और दशहरी आम दुबई (Dubai) निर्यात किया गया था। जून 2020 में बनारसी लंगड़ा, दशहरी, चौसा और रामकेला आम की 1.5 मीट्रिक टन खेप लंदन (London) भेजी गई थी। एंव जून 2020 में चंदौली के किसानों द्वारा 80 मीट्रिक टन काले चावल (Black Rice) की खेप आस्ट्रेलिया और दोहा कतर भेजा गया था।

 

कोरोना संक्रमण की पहली वेव 2020 में लॉकडाउन के बीच वाराणसी और पास के अन्य जिलों के किसान हरी मटर, ककड़ी, लौकी और मिर्च सहित अन्य हरी सब्जियों की 3 मीट्रिक टन खेप लंदन (London) भेजे थे।

बनारसी लंगड़ा आम

‘लंगड़ा’ आम (Langra Mango) जिसे बनारसी लंगड़ा के नाम से भी जाना जाता है। मुख्य रूप से वाराणसी, या उत्तरी भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान में उगाई जाने वाली आम की किस्म है। उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में और बिहार में ‘लंगड़ा’ आम को ‘डंका’ आम के नाम से भी जाना जाता है। पकने के दौरान यह किस्म हरे रंग की होती है। आमतौर पर इसकी कटाई जुलाई के अंतिम पखवाड़े में की जाती है। 2006 के आसपास इसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में लोकप्रियता हासिल करने के लिए जाना जाता था। इसे स्लाइसिंग और कैनिंग के लिए उपयुक्त माना जाता है।

 

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