प्रणब मुखर्जी (Pranab Mukherjee) की अंतिम किताब, पीएम मोदी के लिए सलाह और सोनिया गांधी की गलतियां

प्रणब मुखर्जी द्वारा लिखी गई किताब ‘द प्रेसिडेंशियल ईयर्स’ चर्चा का विषय बनी हुई है। किताब में जवाहरलाल नेहरू को लेकर कई तरह के खुलासे किए गए हैं।

नई दिल्ली: भारत के पूर्व राष्ट्रपति और भारत के कद्दावर नेता में गिने जाने वाले प्रणब मुखर्जी (Pranab Mukherjee) ने साल 2020 में देश को अलविदा कह दिया था। 31 अगस्त को ब्रेन सर्जरी के दौरान प्रणब मुखर्जी की मृत्यू हो गई। हालांकि, आखिरी समय में उन्होंने अपने  संस्मरण को पूरा किया था। अब उनके द्वारा लिखी गई किताब ‘द प्रेसिडेंशियल ईयर्स’  चर्चा का विषय बनी हुई है। मुखर्जी द्वारा लिखी गई इस किताब में जवाहरलाल नेहरू को लेकर कई तरह के खुलासे किए गए हैं। मुखर्जी की इस किताब में सिर्फ नेहरू ही नहीं बल्कि सभी राजनीतिक पार्टियों के नेताओं के बारे में भी चर्चा की गई है जिसमें पीएम नरेंद्र मोदी, केजरीवाल और सोनिया गांधी का नाम शामिल है।

‘भारत में विलय होना चाहता था नेपाल’

ऑटोबायोग्राफी में प्रणब मुखर्जी ने लिखा है कि राजा त्रिभुवन बीर बिक्रम शाह ने नेहरू को यह प्रस्ताव दिया था कि नेपाल का भारत में विलय कर उसे एक प्रांत बना दिया जाए, लेकिन तब तत्कालीन प्रधानमंत्री ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। उन्होंने आगे लिखा है कि अगर इंदिरा गांधी नेहरू के स्थान पर होतीं, तो इस अवसर को जाने नहीं देतीं जैसे उन्होंने सिक्किम के साथ किया था।

सभी की अलग धारणाएं होती हैं

भारत के पूर्व प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपतियों पर अपने विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने किताब में उल्लेख किया है कि प्रत्येक पीएम की अपनी कार्यशैली होती है। लाल बहादुर शास्त्री ने ऐसे पद संभाले जो नेहरू से बहुत अलग थे। उन्होंने लिखा कि विदेश नीति, सुरक्षा और आंतरिक प्रशासन जैसे मुद्दों पर एक ही पार्टी के होने पर पर भी प्रधानमंत्रियों के बीच अलग-अलग धारणाएं हो सकती हैं।

‘पीएम को असहमति की भी आवाज सुननी चाहिए’

किताब में  मुखर्जी (Pranab Mukherjee) ने लिखा कि पीएम मोदी को ‘असहमति की आवाज भी सुननी चाहिए और संसद में अक्सर बोलना चाहिए। विपक्ष को समझाने और देश को उसके बारे में अवगत कराने के लिए उन्हें इसका एक मंच के रूप में उपयोग करना चाहिए। आगे लिखा कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के दौरान वह विपक्षी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के साथ-साथ संप्रग के भी वरिष्ठ नेताओं के साथ लगातार संपर्क मंक रहते थे और जटिल मुद्दों का समाधान निकालते थे।

मुखर्जी ने पीएम को दी सलाह

पुस्तक में उन्होंने लिखा है कि चाहे जवाहलाल नेहरू हों, या फिर इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी अथवा मनमोहन सिंह, इन सभी ने सदन के पटल पर अपनी उपस्थिति का अहसास कराया। आगे लिखा कि अपना दूसरा कार्यकाल संभाल रहे प्रधानमंत्री मोदी को अपने पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों से प्रेरणा लेनी चाहिए और संसद में उपस्थिति बढ़ाते हुए एक नजर आने वाला नेतृत्व पर भी देना चाहिए ताकि वैसी परिस्थितियों से बचा जा सके जो हमने उनके पहले कार्यकाल में संसदीय संकट के रूप में देखा था।

‘सोनिया गांधी के द्वारा लिए गए गलत फैसले’

प्रणब मुखर्जी ने संस्मरण में लिखा, “मुझे लगता है कि संकट के समय पार्टी नेतृत्व को अलग दृष्टिकोण से आगे आना चाहिए। अगर मैं सरकार में वित्त मंत्री के तौर पर काम जारी रखता, तो मैं गठबंधन में ममता बनर्जी का रहना सुनिश्चित करता। इसी तरह महाराष्ट्र को भी बुरी तरह संभाला गया। इसकी एक वजह सोनिया गांधी की तरफ से लिए गए फैसले भी थे। मैं राज्य में विलासराव देशमुख जैसे मजबूत नेता की कमी के चलते शिवराज पाटिल या सुशील कुमार शिंदे को वापस लाता।”

‘2014 में कांग्रेस को झेलनी पड़ी मार’

मुखर्जी ने लिखा, “मुझे नहीं लगता कि मैं तेलंगाना राज्य के गठन को मंजूरी देता। मुझे पूरा भरोसा है कि सक्रिय राजनीति में मेरी मौजूदगी से यह सुनिश्चित हो जाता कि कांग्रेस को वैसी मार न पड़ती, जैसी उसे 2014 लोकसभा चुनाव में झेलनी पड़ी।

निधन से पहले लिखी थी किताब

बता दें कि प्रणब मुखर्जी ने यह पुस्तक पिछले साल अपने निधन से पहले लिखी थी। रूपा प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक मंगलवार को बाजार में आई है।

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