AC कमरों से तपती धूप तक, आसमानी सितारों की ज़मीनी सियासत

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श्वेता त्रिपाठी, (Edited by VIKAS GOSWAMI): एक वक्त था जब सितारे ‘गर्दिश’ में हुआ करते थे आजकल अपने स्टार महोदय सियासी रंग में सराबोर हुये नगरी – नगरी द्वारे द्वारे ख़ाक छानते फिर रहे हैं। क्यों भई ? बिल्कुल सही पकड़े हैं, चुनाव जो सर पर है।

बात नयी तो बिल्कुल नहीं है क्योंकि सितारों की सियासत में एंट्री का भी अपना एक इतिहास रहा है। टेलिविजन और फिल्मों के वे कलाकार जो अपने अभिनय के बलबूते पर दर्शकों का दिल जीत चुके हैं और कुछ हद तक युवाओं के ‘रोल मॉडल’ भी बनते नज़र आ रहे हैं ,वे या तो स्वयं राजनीति का रुख़ करते रहे या लाये भी जाते रहे। उसपर भी आलम ये रहा कि बगैर राजनीति से कोई वास्ता रखे,बिना जनसरोकारों को समझे केवल ‘खोखली फिल्मी लोकप्रियता ‘ के सहारे ये राजनीति के रण में विजयी भी रहे ।

इन हालात में जब देश की लगभग सभी राजनीतिक पार्टियाँ और फिल्म जगत के चर्चित चेहरे मिलकर चुनाव के मद्देनजर मात्र अपना उल्लू सीधा करने के लिये “तारे ज़मीं पर” की कल्पना को साकार में जुटे हुये हैं तो सवाल तो उठता है ना ? सवाल ये उठता है कि केवल चुनावों में नज़र आने वाले “स्टार” महोदय क्या हमारी ज़मीनी हक़ीकत से कोई वास्ता रखते हैं? सवाल ये भी उठता है कि क्या ये सही मायनो मे आवाम की आवाज़ बन पायेंगे या केवल जननेता होने का ‘अभिनयमात्र’ ही करते रह जायेंगे ?

अब सवाल ये भी है कि आखिर क्यों कहा जाता है कि इनका जनसामान्य की आवश्यकताओं से कोई वास्ता नहीं है? वो इसलिये क्योंकि ग्लैमर वर्ल्ड की कोई भी मशहूर हस्ती एक कार्यकर्ता के तौर पर किसी दलविशेष में शामिल नहीं होती बल्कि राजनीति में पदार्पण की पहली शर्त ही संभवतः “टिकट” होती है। यहाँ एक तरफ सितारे की एंट्री हुई नहीं कि दूसरी ओर मीडिया हाउसेज में स्टार महाशय के टिकट और सीट को लेकर कयास जोर पकड़ने लगते हैं और इस चकाचौंध की राजनीति में पीछे रह जाता है पार्टी की लाइन में खड़ा अंतिम व्यक्ति , पार्टी का आम कार्यकर्ता। आम कार्यकर्ता , जो कि जनसाधारण के बीच से आता है ,जिसे हर ज़मीनी हक़ीकत का पूरा इल्म है, जिसके दम पर किसी दल की जीत सुनिश्चित होती है वो इस ग्लैमर में गुम हो जाता है। याद रखने की बात ये है कि किसी राजनीतिक पार्टी का भविष्य इस बात पर बिल्कुल निर्भर नहीं करता कि उसके पास कितने “सितारे” हैं बल्कि इस बात पर निर्भर करता है कि उस दल विशेष के का्यकर्ता का जोश कितना हाई है।

विचारणीय बात ये है कि कि क्या ये सितारे जिनके “दर्शन” भी जनसाधारण के लिये “दुर्लभ” हैं , इन्हें अपना नेता चुनकर हमारा कुछ भी भला हो सका है? शायद नहीं। क्योंकि तमाम ऐसे उदाहरण मौजूद है जब यही “स्टार्स” सांसद या विधायक बनने के बाद अपने क्षेत्र की जनता के प्रति अपना कर्तव्य भूलकर दोबारा फिल्मों की तरफ ऐसा रुख़ करते हैं कि वापस राजनीति की ओर मुड़कर देखने में अपना नुकसान देखने लगते हैं।

याद होगा गोविंदा के विरोध में उनके संसदीय क्षेत्र में उनकी गुमशुदगी के पोर्टर तक लगा दिये गये थे और जुलाई 2004 में बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिये सांसद निधि से एक रूपया भी खर्च न करने के आरोप लगे थे।
राजेश खन्ना साहब की सियासी पारी की भी कमोबेश यही दशा रही , 1992 में सियासत में आने के बाद ऐसे ही विरोध के चलते 1996 में राजनीति को अलविदा कहना पड़ा।
19984 में महानायक अमिताभ बच्चन भी राजनीति का हिस्सा बने और 8वीं लोकसभा के आमचुनाव में दिग्गज नेता हेमवती नंदन बहुगुणा को क़रीब डेढ़ लाख मतों से शिकस्त भी दी ।फिर उनपर भी बोफोर्स घोटाले में दलाली के आरोप लगे और अभिनेता जी को नेतागिरी छोड़नी पड़ी।
फिर भी इन अभिनेताओं की नैतिकता मानी जानी चाहिये कि एक बार जनता ने नकार दिया और इन्हें लगा कि ये अपने कर्तव्य के साथ न्याय नहीं कर पाये हैं तो इन हस्तियों ने राजनीति को पूर्णतः “तिलांजलि” दे दी।
परन्तु उन अभिनेता-कम-नेताजी का क्या करें जो हार के डर से कभी सीट तो कभी पार्टी बदलते हुये पाये जाते हैं।
10 साल पीछे लिये चलते हैं आपको, सन् 2009 में 14वीं लोकसभा के चुनाव का वक्त, भोजपुरी फिल्मों के शीर्ष अभिनेता मनोज तिवारी गोरखपुर सदर की सीट से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार थे और उनके विपक्ष में थे भारतीय जनता पार्टी से योगी आदित्यनाथ, नतीजा ये रहा कि योगी के गढ़ में मनोज तिवारी पराजित हुये।लेकिन 2014 में यही मनोज तिवारी भारतीय जनता पार्टी के कैंडिडेट के तौर पर उत्तर पूर्व दिल्ली से लड़े और विजयी भी रहे।आज वे दिल्ली में भाजपा के पार्टी अध्यक्ष भी हैं।और इसी क्रम में रविकिशन जो कांग्रेस का “हाथ” छोड़कर भाजपा में शामिल हो गये, जयाप्रदा जो समाजवादी पार्टी छोड़कर भाजपा के साथ आयीं, सपना चौधरी भी भाजपा और कांग्रेस दोनों से नजदीकियाँ बढ़ाकर चर्चा का केन्द्र रहीं। सबको देखा जाय तो ये फेहरिस्त काफ़ी लम्बी हो जाती है।
तो कुलमिलाकर, लोकप्रियता के सहारे राजनीतिक स्वीकार्यता पाने के लिये लोग सीट से लेकर दल और विचारधारा तक बदलने में एक मिनट भी नहीं लगाते।

हमें सोचना होगा कि बिना किसी राजनीतिक ट्रेनिंग और अनुभव के डायरेक्ट टिकट मिलने की शर्त पर राजनेता का चोला पहने ये अभिनेता क्या अपने कर्तव्यों को लेकर गम्भीर हैं? क्या ये जनता की समस्याओं और मुद्दों से कोई इत्तेफा़क रखते हैं? कहीं ग्लैमर के चक्कर में हम अपने देश के विकास के साथ समझौता तो नहीं कर रहे?

मेरा राजनीति में आने वाले फिल्मस्टार्स से कोई विरोध नहीं है । जो देश की सेवा में अपना योगदान राजनीति के माध्यम से देना चाहते हैं उनका स्वागत है ।लेकिन मेरे विचार से उन्हें एक स्टार के तौर पर नहीं बल्कि एक आम कार्यकर्ता के रुप में किसी दल में शामिल करना चाहिये जिससे कि “वैनिटी वैन” में ही आधी ज़िन्दगी गुजार देने वाले लोग ज़मीनी मुद्दों और जन सरोकारों से जुड़े और जिम्मेदारी मिलने पर जनता की जरूरतें पूरी कर सकें। वे स्वयं लोकप्रियता से जनस्वीकार्यता तक का सफर तय कर सकें और साथ ही साथ राष्ट्र के विकास के पथ पर अग्रसर करके राष्ट्रनिर्माण में भागीदार भी बनें।

धन्यवाद

श्वेता त्रिपाठी :छात्रा स्नातक (द्वितीय वर्ष)

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