समाजसेवा : ये क्‍या हो रहा है भइया, ये क्‍या हो रहा है…

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आजकल दुनियाभर मे समाजसेवा नाम कमाने का एक जरिया बन गयी है। सेवा मीलों पीछे छूट गयी है और समाजसेवा से ज्यादा ये स्वसेवा या स्वउत्थान का माध्यम बन गयी है। इस तरह से कार्य के लिए कई स्वयंभू संगठन भी बन गये हैं। कई तो ऐसे हैं जिनकी विश्वभर में शाखाएं हैं।

समाजसेवा क्षेत्र के पुरोधा माने जाने वाले लायंस क्लब और रोटरी क्लब इस क्षेत्र मे कार्यरत ऐसे संगठन है जो कि दुनियाभर मे एक आदर्श माने जाते हैं। दुनिया के लगभग हर देश के बड़े व प्रमुख शहरों मे इनकी शाखाएं हैं। इन संस्थाओं की नींव उस दौर मे रखी गयी थी कि जब बड़े-बड़े लोग आपस मे मिल नहीं पाते थे। न ही गेट-टू-गेदर या इस तरह का कोई अन्य कार्यक्रम तब आयोजित करने का प्रचलन था। तब इन संगठनों से प्रबल बौद्धिक स्तर वाले लोगों को जोडा जाता था।

अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा निःस्वार्थ समाज के निचले स्तर के लोगों तक पहुंचाने के लिए ये तबका सदैव तत्पर रहता था। इन
संगठनों की ओर से होने वाले कार्यक्रमों मे वे अपनी-अपनी सहयोग राशि अवश्य देते थे। इसका प्रचलन आज भी है। लेकिन धीरे-धीरे इसका रूप परिवर्तित होता गया।

भामाशाहों, दानवीरों और महर्षि दधीचि की धरती माने जाने वाले भारत जैसे विकासशील देश के प्रबुद्ध लोग भी इन संगठनों का हिस्सा बनने लगे थे। यहां के हर प्रमुख शहर मे रोटरी व लांयल क्लब की शाखाएं है। दरअसल, हमारे यहां इन संगठनों से जुडना स्टेटस सिंबल के रूप में देखा जाता है।

कम्युनिटी सेंटर या दूसरी जगहों की बजाय इनके आयोजन पांच सितारा होटलों मे होने लगे। ऐसे मे यहां समाज की सेवा पर कम और फाइव स्टार कल्चर पर ज्यादा फोकस किया जाने लगा। ज्यादा पैसा, तड़क-भड़क पर खर्च किया जाने लगा। समाजसेवा के क्षेत्र मे पूरे विश्व मे कई संगठन और एनजीओ है जो कि अपनी-अपनी गणित और गुणा-भाग से कार्यरत हैं।

इन क्लबों से जुड़े तमाम तथाकथित स्वयंभू मठाधीशों को आत्ममंथन करना चाहिए कि अगर वो सभी क्लब को ज्वाइंट करके पूरे पैसे को ईमानदारी से खर्च करें तो हमारे देश मे खुशहाली की गंगा बह उठेगी। दरअसल, ये लोग मिलने-मिलाने के लिए इन क्लबों से जुडते है और उन्हें खाने-पीने की आवश्यकता नहीं है।

एक बात पक्की है कि तमाम विदेशी संगठनों, संस्थानों और क्लबों को मिलने वाली रकम का बड़ा हिस्सा, उनके विदेश स्थित मुख्यालय को जाता है। इस प्रकार अनचाहे तरीकों से हम भारतीय पैसे को बाहर भेज रहे हैं। मेरा मानना है कि इन विदेशी क्लबों को दो बातों पर गौर करना चाहिए। पहली, वो भारतीय पैसों को बाहर न भेजें। दूसरी, वो मीटिंग मे होने वाले जलपान की राशि को गरीबों की मदद मे खर्च करें। बड़े क्लबों मे पदाधिकारी बनने के लिए लोग बड़ी रकम खर्च करने को लालायित रहते हैं। वो पैसा गरीबों के कल्याण और उत्थान मे खर्च होना चाहिए।

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