प्रदूषणरहित होने लगी गंगा, बढ़ी डाल्फिनें

dolphin (1)इलाहाबाद। प्रदूषण और गंदगी से तबाह गंगा नदी में पल रहे जलचरों के मरने की खबरें तो आपने खूब पढ़ी होंगी। लेकिन यहां जस्ट उलट गुड न्यूज है।

वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर  के सर्वे रिपोर्ट के अनुसार 2015 में गंगा नदी में डॉल्फिन मछलियों की संख्या तीव्र गति से बढ़ रही है। गंगा नदी में डालफिन मछलियों की संख्या बढक़र दोगुनी हो गई है। डब्लूडब्लूएफ और अन्य सर्वे संगठनों के द्वारा  चार दिवसीय सर्वे किया गया। यह सर्वे इस वर्ष 5 अक्टूबर से लेकर 8 अक्टूबर तक  किए गए। सर्वे में गंगा नदी में 1263 डॉल्फिन मछलियों  की उपस्थिति दर्ज की गई।

इसके पहले 2012 में डालफिन मछलियों की संख्या  671 ही थी। प्रदेश सरकार द्वारा जारी इस आंकड़े के मुताबिक गंगा, यमुना, चंबल, घाघरा, केन, राप्ती, शारदा और बेतवा नदी में करीब 3350 किमी इलाके में हुए सर्वे में यह आंकड़े सामने आए हैं।

तीन साल बाद हुई गणना

2012 के बाद दो साल तक  डालफिन मछलियों की गणना नहीं हुई। इससे पहले डब्लूडब्लूएफ ने 2005 में गंगा में 600 डॉल्फिन होने की बात कही थी। गौरतलब है कि गंगा में कानपुर से लेकर प्रतापगढ़ और वहां से इलाहाबाद के पहले तक के एरिया को डॉल्फिन के लिए बेहतरीन क्षेत्र माना जाता है।

गंगा में जीवन और मौत के बीच खेल रहे  जलचर

सर्वे रिपोर्ट को देखने के बाद वैज्ञानिकों का कहना है कि गंगा में डॉल्फिन बढऩे के आंकड़े यह साबित करते हैं कि नदी का इको सिस्टम सुधर रहा है। यह सर्वे डॉल्फिन प्रजाति पर मंडरा रहे संभावित खतरे को देखते हुए डाटा बेस बनाने के लिए किया गया है। इसका मकसद गंगा किनारे रहने वाले लोगों में डॉल्फिन को बचाने ओर उसे बढ़ाने के प्रति जागरुकता पैदा करना है। विशेषज्ञों के मुताबिक गंगा में प्रदूषण और गंदगी बढऩे के कारण डॉल्फिन का जीवन खतरे में है। आंकड़े भले दोगुने हो गए हों लेनिक यह इस जीव के आगे बचे रहने के लिए काफी नहीं है। इस पर अभी और ध्यान देने की जरूरत है।

सुंइस नाम से जानी जाती हैं डाल्फिन

डॉल्फिन को इलाहाबाद और आसपास के इलाके में सुंइस नाम से जाना जाता है। गंगा नदी में डाल्फिन की संख्या जानने के लिए गणना गंगा में कानपुर बैराज से शुरू की गई। गणना में लगी नावें 10 किमी प्रतिघंटा की रफ्तार से चलकर एक दिन में करीब 60-70 किमी का सफर तय करती थीं। इससे पूर्व प्रदेश में पहली बार डॉल्फिन की गणना के लिए 2012 में वैज्ञानिक तकनीक इस्तेमाल करते हुए शुरुआत की गई थी। तब 2,800 किमी एरिया में इनका आंकड़ा 671 आया था।

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