बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ के तहत बच्चियों को नहीं मिली सही शिक्षा, आंकड़ों ने बयां की हकीकत

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान का राज्यों में प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा है. जिसके आंकड़े केंद्र में समिति ने प्रस्तुत किए है.

नई दिल्ली. केंद्र सरकार द्वारा 2015 में लॉन्च की गई ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ का प्रदर्शन राज्यों में अच्छा नहीं रहा है. इसको लेकर महिला सशक्तिकरण समिति की नवीनतम रिपोर्ट सरकार की तरफ से जारी किये धन का सही उपयोग ना होने को लेकर निराशा जाहिर की है. बता दें कि महाराष्ट्र भाजपा लोकसभा सांसद हीना विजयकुमार गावित की अध्यक्षता वाली समिति ने गुरुवार को लोकसभा में इससे जुड़ी रिपोर्ट पेश की. शिक्षा के माध्यम से महिलाओं के सशक्तिकरण” पर हीना गावित ने पांचवीं रिपोर्ट पेश की गई. रिपोर्ट में कहा गया है कि योजना के लगभग 80 प्रतिशत धनराशि का उपयोग इसके विज्ञापन के लिए किया गया है, न कि महिलाओं के लिए स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दों पर। समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि 2014-15 में इसकी शुरुआत के बाद से 2019-20 तक, इस योजना के लिए कुल 848 करोड़ रुपये मंजूर हुआ। 2020-21 में महामारी के काल को छोड़कर इस दौरान राज्यों को 622.48 करोड़ रुपये की राशि जारी की गई.

विज्ञापनों में खर्च किया 400 करोड़ से भी अधिक

समिति की रिपोर्ट में कहा गया है, “केवल 25.13% धन, यानी 156.46 करोड़ रुपये, राज्यों द्वारा खर्च किए गए हैं, जो इस योजना के अनुमानित लक्ष्य के अनुरूप प्रदर्शन नहीं है” समिति की रिपोर्ट के अनुसार 2016- 2019 के दौरान जारी किए गए कुल 446.72 करोड़ रुपये में से, केवल मीडिया विज्ञापनों पर 78.91% खर्च किया गया.

बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का क्या है उद्देश्य

गौरतलब है कि बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओं का संचालन महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय और मानव संसाधन विकास मंत्रालय एक राष्ट्रीय पहल के तौर पर होता हैं. इसका उद्देश्य लड़कियों के साथ होने वाले सामाजिक भेदभाव को खत्म करना और उनके प्रति लोगों की नकारात्मक मानसिकता में बदलाव लाना है. इसके अलावा योजना का उद्देश्य लिंगानुपात को कम करना, महिला सश्क्तिकरण को बढ़ावा देना है.

 

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