Google ने पहेली सत्याग्रही महिला सुभद्रा कुमारी चौहान की जयंती पर दिया शानदार ट्रिब्यूट, गूगल ने बनाए डूडल

आज सुप्रसिद्ध कवयित्री और लेखिका “सुभद्रा कुमारी चौहान” की जयंती है।  Google ने एक आकर्षक डूडल बनाया है

नई दिल्ली: आज सुप्रसिद्ध कवयित्री और लेखिका “सुभद्रा कुमारी चौहान” की जयंती है।  Google ने एक आकर्षक डूडल बनाया है, काभी बचपन में आप सभी ने “खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।”  पंक्तियां जरूर बोली और सुनी होंगी, आपको बता दें, इन पंक्तियों को सुभद्रा कुमारी चौहान ने ही लिखा था, आज उनकी 117वीं जयंती हैं। गूगल ने काफी खूबसूरती से सुभद्रा कुमारी चौहान का डूडल बनाया और जिसमें वह सफेद साड़ी में दिख रही हैं और कुछ सोचते हुए लिख रही हैं।  उनके पीछे घोड़े पर झांसी की रानी लक्ष्मीबाई  और स्वतंत्रता आंदोलन सेनानी की एक छवि भी दिख रही है।  आपको बता दें,  सुभद्रा कुमारी के दो कविता संग्रह और तीन कथा संग्रह प्रकाशित हुए पर उन्हें सबसे ज्यादा प्रसिद्धि झांसी की रानी (कविता) के कारण मिली थी।

सुभद्रा कुमारी चौहान
सुभद्रा कुमारी चौहान

 

जाने कौन थी सत्याग्रही सुभद्रा कुमारी चौहान

सुभद्रा कुमारी का जन्म 16 अगस्त 1904 के दिन इलाहाबाद के निकट निहालपुर नामक गांव में रामनाथसिंह के जमींदार परिवार में हुआ था, उन्हें बचपन से ही कविता लिखने का शौक था।  सुभद्रा कुमारी चौहान, चार बहने और दो भाई थे और उनके पिता ठाकुर रामनाथ सिंह शिक्षा के प्रेमी थे और उन्हीं की देख-रेख में उनकी शुरुआती पढ़ाई शुरू हुई, आपको बता दें, वह 1921 में महात्मा गांधी जी के असहयोग आंदोलन में भाग लेने वाली वह प्रथम महिला थीं, वो दो बार जेल जेल भी जा चुकी थी,  सुभद्रा कुमारी चौहान की जीवनी, उनकी पुत्री, सुधा चौहान ने “मिला तेज से तेज” नामक पुस्तक में लिखी है।

सुभद्रा कुमारी चौहान
सुभद्रा कुमारी चौहान

जाने कब और कैसे बनी देश की पहेली सत्याग्रही महिला

स्वतंत्रता के लिए महात्मा गांधी की ओर से पूरे देश में सत्याग्रह आंदोलन चलाया जा रहा था। उस दौरान साल 1922 में जबलपुर के “झंडा सत्याग्रह” में शामिल होकर वो  देश की पहली महिला सत्याग्रही बनी थीं।  स्वाधीनता के लिए रोज सभाएं करती थीं जगह-जगह जा जाकर जिनमे सुभद्रा कुमारी चौहान अपने विचार रखती और अपने देश के प्रति लोगों को जागुरूक करती।

सुभद्रा कुमारी चौहान
सुभद्रा कुमारी चौहान

उनकी लिखी कविता की कुछ पंक्तियाँ

छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छिनी बातों-बात

कैद पेशवा था बिठुर में, हुआ नागपूर का भी घात,

उदयपुर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात?

जबकि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर हुआ था व्रज-निपात।

बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुहँ हुमने सुनी कहानी थीं,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।।

रानी रोई रिनवासों में, बेगम ग़म से थीं बेजार,

सरे आम नीलम छापते थे अंग्रेजों के अखबार,

नागपूर के जेवर ले लो लखनऊ के लौ नौलख हार।

यों परदे की इज्जत परदेशी की हाथ बिकीनी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुहँ हुमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वो तो झँसीं वाली रानी थी।।

 

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