छोटे पड़ रहे हिंदुओं के कब्रिस्तान

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07a99e0c-8efb-4fb0-a2f1-b0f30a0ebbcdकानपुर। गंगा में शव व अस्थियां प्रवाहित करने पर रोक है। जिससे शमशान घाट तक आने वाले शवों को जलाकर उनकी अस्थियां घाटों के आसपास ही दफनाई जा रही हैं। वहीं बच्चों या रोगों से हुई मौत पर शव जलाने की प्रथा न होने पर इन्ही घाटों में मिट्टी में दबाया जा रहा है। जिससे यह शमशान घाट अब हिंदुओं के कब्रिस्तान बन रहे हैं।

पहले लोग किसी अपने की मौत होने पर शव शमशान घाट लेकर जाते थे। फिर शव को नहलाकर चिता लगाई जाती थी। फिर चिता से चुने हुए फूल श्रद्धानुसार गंगा में प्रवाहित करते थे। चिता की राख भी गंगा में बहा दी जाती थी। लेकिन अब यह राख या अन्य अवशेष जमीन में गाड़े जा रहे हैं। वहीं जिनकी चिता नहीं लगती उन्हें यहीं गाड़ा जा रहा है। जिससे सिमित जगह होने के चलते यह कब्रिस्तान छोटे पड़ते जा रहे हैं।

प्रवाहित होने वाले शव कब्र में हो रहे दफन

हिंदुओं में प्रथा है कि यज्ञोपवीत न होने वाले की मौत पर उसके शव की चिता नही लगाई जाती। शव को गंगा की गोद में प्रवाहित कर दिया जाता था। इसी तरह गंभीर रोग से हुई मौत पर भी शव को नहीं जलाने की प्रथा है। लेकिन जब से गंगा में शव प्रवाहित करने पर रोक लगी है तो ऐसे शवों को गंगा स्नान कराकर जमीन पर दफन किया जा रहा है। जिससे शमशान घाट में कब्रों की संख्या बढ़ने लगी है।

जगह कम होने से भी समस्या

शव गाड़ने के चलते अब इन घाटों में जगह की भी समस्या पैदा होने लगी है। किनारों पर सीमित भूमि होने के चलते थोड़े ही स्थानों पर इन्हें दफन किया जा रहा है। पहले से बनी कब्र पर फिर किसी अपने को गाड़ने से भी लोग खुद को काफी असहज महसूस करते हैं।

शहरी क्षेत्र के घाट और भी तंग

ग्रामीण क्षेत्रों के शमशान घाटों में गंगा किनारे तो कुछ बहुत खाली भूमि भी मिल जाती है। लेकिन शहर के घाटों में और अधिक समस्या होती है। शवों को गाड़ने के लिए यहां जगह न होने के चलते उन्हें जलाना ही एक मात्र विकल्प है। यदि कोई नहीं जलाना चाहता तो उसे ग्रामीण क्षेत्र के घाट शव लेकर जाना पड़ता है।

विद्युत् शव दाह गृह ज्‍यादा स्वीकार्य नहीं

शहरी क्षेत्र के कई घाटों में विद्युत् शव दाह गृह भी स्थापित किये गए हैं। इनमें केवल रख ही बचती है। लेकिन पुरखों से चली आ रही परंपरानुसार लोग लकड़ी से ही चिता जलाने को वरीयता देते हैं। जिससे राख और अवशेष ज्‍यादा बच जाते हैं।

गन्दे नालों पर नहीं लग पा रही रोक

यह सही है कि तमाम प्रयासों के बावजूद गंगा में गिरने वाले गन्दे नालों पर रोक नहीं लग पा रही है। लोगों का मानना है कि एक नाला पूरे दिन में इतनी गन्दगी गंगा में मिला देता है। जितने पूरे दिन शव प्रवाहित होने पर भी गंगा गन्दी नही होती। तो फिर सैकड़ों नाले गिरने से क्या हाल होगा। लेकिन इस पर तमाम सख्ती के बावजूद रोक नहीं लग पाई। अपनी माँ का शव लेकर ग्रामीण क्षेत्र के नजफगढ़ घाट पहुंचे कानपुर के भीतरगांव निवासी दिनेश अवस्थी व कमलेश का कहना था कि गंगा में शवों का अंतिम संस्कार पुरखों से चली आ रही व्यवस्था है। तब कभी गंगा प्रदूषित नहीं हुई। जब से शहरों का कचरा इसमें जाने लगा तभी से गंगा की यह दुर्दशा हुई है। इसलिए उसे रोका जाना चाहिए।

नहीं मिल पा रही सन्तुष्टि

सनातनी प्रथा पर रोक शव के साथ आये परिजनों को सन्तुष्टि नहीं दे पा रही है। उन्हें लगता है कि पुरखों से चली आ रही परम्परा के अनुसार वह अंतिम संस्कार नहीं कर पा रहे हैं। केवल शव को स्नान कराने को ही मिल पाता है। ग्रामीणों के अनुसार उन्हें लगता है कि मरने वाले को गंगा नहीं मिली तो मुक्ति कैसे मिलेगी।

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