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मानवता हुई शर्मशार! रेप के झूठे आरोप में बेकसूर ने जेल में गुजारे 20 साल, पढ़े पूरा मामला

नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश के जिला ललितपुर के निवासी 43 वर्षीय विष्णु तिवारी को रेप के एक झूठे आरोप में 20 साल से जेल (Jail) में बंद रखा गया। वह रेप और एट्रोसिटीज के तहत एससी/एसटी एक्ट में दर्ज हुए केस की सजा पिछले 20 साल से आगरा सेंट्रल जेल (Central Jail) में काट रहा था। लेकिन अब इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद विष्णु को 3 मार्च को बाइज्जत बरी कर दिया गया। अब राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग इस मामले में नाराजगी जाहिर करते हुए यूपी के मुख्य सचिव और डीजीपी को एक नोटिस भेजा है।

इस नोटिस में दोषी पुलिस वालों के खिलाफ कार्रवाई करने की बात लिखी है साथ ही पीड़ित के पुर्नवास की ओर भी ध्यान दिलाया है। इससे पहले आगरा के सोशल और आरटीआई एक्टिविस्ट नरेश पारस ने इस संबंध में आयोग को एक पत्र लिखा था। यूपी को भेजे गए नोटिस में आयोग ने लिखा है कि इस मामले में जिम्मेदार लोक सेवकों के खिलाफ की गई कार्रवाई और पीड़ित को राहत और पुनर्वास के लिए उठाए गए कदमों को शामिल करना चाहिए। पीड़ित ने जो 20 साल जो जेल में गुजारे है, इससे वो आघात, मानसिक पीड़ा और सामाजिक कलंक झेला है। इस नोटिस पर उन्होंने 6 सप्ताह के अंदर प्रतिक्रिया मांगी गई है।

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क्या लगी थी धारा

ललितपुर के महरौनी थाना क्षेत्र के सिलावन गांव के निवासी विष्णु तिवारी पर एक महिला ने रेप का झूठा आरोप लगाया था। महिला का आरोप था कि जब वह घर से खेत में काम करने के लिए जा रही थी तब उसका रेप किया था। पुलिस ने विष्णु तिवारी को 16 सितंबर 2000 को गिरफ्तार करके आईपीसी की धारा 376, 506 और एससी/एसटी एक्ट की धारा 3 (1) (7), 3 (2) (5) के तहत मामला दर्ज किया था। उस वक्त विष्णु की उम्र 23 साल थी। सिर्फ इतना ही नहीं साल 2003 में उसपर कोर्ट ने 10 साल और एससी/एसटी एक्ट के तहत आजीवन कारावास की सजा सुनाई। कोर्ट के मुताबिक, दोनों सजाएं साथ-साथ चलनी थीं।

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परिवार हो गया खत्म

जेल से रिहा होकर विष्णु तिवारी भावुक होकर कहते हैं, “मैं जेल में 20 साल से बंद था। बाहर माता-पिता ने जमीन बेचकर मुझे निर्दोष साबित करने की आखिरी दम तक लड़ाई लड़ी। हार्ट अटैक से मेरे माता-पिता का निधन हो गया। इसके बाद दो भाइयों का भी देहांत हो गया।” पुराने दिनों को याद करते हुए विष्णु ने कहा कि “हमारे पास खुशहाल परिवार था, खेत थे, इंजन था, बैल थे, तीन हल चलते थे, दस भैंसें थीं, लेकिन आज कुछ नहीं है। जब घर पहुंचा तो देखा यहां कुछ भी नहीं है।”

 

 

 

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