क्या वाकई जरूरी नहीं है एमडीडीए ?

utt-mdda-6

देहरादून। उत्तराखंड की राजधानी में कई बार चले आंदोलनों में एक मांग उठती रही है। वो मांग मसूरी देहरा विकास प्राधिकरण यानी एमडीडीए को खत्म कर देने की है। तर्क यही है कि जिस अनियोजित विकास को रोकने का एक प्राधिकरण होने के नाते एमडीडीए पर जिम्मा है, वो उसमें खरा नहीं उतर पा रहा। स्मार्ट सिटी के लिए चली बहस के बीच एक बार फिर एमडीडीए के औचित्य से जुड़े कई सवाल उठ रहे हैं। ताजा मामले में आवास सचिव और एमडीडीए वीसी को आम आदमी पार्टी की तरफ से जो करारा जवाब दिया गया है, उसकी भी चर्चा हो रही है।

utt-mdda-2

देहरादून-मसूरी समेत 180 गांव एमडीडीए के अधीन हैं। यहां पर निर्माण से जुड़ी हर छोटी-बड़ी बात के लिए एमडीडीए की अनुमति जरूरी है। मगर एमडीडीए की पहचान भ्रष्टाचार को बढ़ावा देकर अनाधिकृत निर्माण पर आंखें बंद कर देने की सरकारी एजेंसी से ज्यादा की नहीं है। स्मार्ट सिटी के निर्माण के लिए चाय बागान के अधिग्रहण पर बवाल मचा हुआ है। याद 2004 में ग्रेटर दून योजना के लिए चली भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया को भी किया जा रहा है।

utt-mdda-4

आवास सचिव और एमडीडीए वीसी आर मीनाक्षी सुंदरम ने दो दिन पहले कहा था कि उस वक्त लोग अधिग्रहण से बासमती चावल की खेती खत्म हो जाने की बात कर रहे थे। भूमि छोड़ दी गई, तो तब भी बासमती चावल की खेती को नहीं बचाया जा सका। पूरी कृषि भूमि पर अनधिकृत निर्माण हो गया है।

utt-mdda-3

हकीकत को भले ही एमडीडीए वीसी ने सामने रखा है, लेकिन इसके साथ ही ये भी साबित हो गया है कि एमडीडीए मानीटरिंग की अपनी भूमिका को सही ढंग से निभा नहीं पाया है। आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता अनूप नौटियाल ने इसी बात को पकड़ा है और एमडीडीए की भूमिका और औचित्य दोनों की समीक्षा की वकालत की है। स्मार्ट सिटी पर फंसी सरकार हालांकि इस नए मामले में नहीं पड़ना चाहती, मगर एमडीडीए से जुड़ी हकीकत उजागर जरूर हो गई है।

Related Articles

Leave a Reply

Back to top button