झगड़े में गर्दन में घुसेड़ा पेंचकस, तीन घंटे माथापच्ची के बाद हो सका ऑपरेशन…..

केजीएमयू ट्रॉमा सेंटर के डॉक्टरों ने एक मजदूर के गर्दन में फंसे पेचकस को आधे घंटे की सर्जरी के बाद बाहर तो निकाल कर जान बचा ली। यह ऑपरेशन भले ही आधे घंटे में पूरा हो गया, लेकिन इसकी योजना बनाने में डॉक्टरों को तीन घंटे लग गए। घायल अब स्वस्थ है। उसे सोमवार को ट्रॉमा से छुट्ट दे दी गई।

डॉ. समीर मिश्रा ने बताया कि शाह आलम नाम का मजदूर दिल्ली से अपनी टीम के साथ गोमती नगर आया था। यहां 16 अप्रैल की रात साथियों से विवाद हुआ। उसके एक साथी ने पेचकस से गर्दन पर वार कर दिया। शाह आलम जब ट्रॉमा सेंटर पहुंचा तो उसकी स्थिति देखकर ऑपरेशन कैसे किया जाए, इसकी रणनीति बनाने में तीन घंटे लग गए।

इससे सबसे बड़ी परेशानी यह थी कि पेचकस में मेटल के चलते न तो सीटी स्कैन हो सकता था और न ही एमआरआई हो सकती थी। एक्स-रे से भी कुछ स्पष्ट नहीं हो रहा था और ब्रांकोस्कोपी में भी स्थिति पता नहीं लग रही थी। हालांकि अंत में डॉ. अनीता ने बिना बेहोशी के इस मरीज का आपरेशन करने की योजना बनाई और ऑपरेशन सफल रहा। सिर्फ सुन्न करके की गई सर्जरी डॉ. अनीता ने बताया कि सीटी स्कैन व एमआरआई कर नहीं सकते थे।

एक्स-रे व ब्रांकोस्कोपी से पता नहीं लग रहा था कि गर्दन में घुसा पेचकस आहार नाल में है या सांस की नली में। सांस नली के बगल से गुजर रही नसें कितनी क्षतिग्रस्त हैं, इसका भी पता नहीं था। नस कटने पर घायल के पैरालिसिस होने का खतरा था। ऐसे में तय किया गया कि पूर्ण बेहोशी के बजाय सिर्फ लोकल एनेस्थीसिया (सुन्न) दिया जाए, ताकि आपरेशन के दौरान कोई नस प्रभावित होती है तो मरीज बता सके कि उसका कौन सा हिस्सा काम नहीं कर रहा है। काफी सोच विचार के बाद उसका आपरेशन बेहोशी के बजाय बजाय सुन्न करके किया गया।

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