उत्तर प्रदेश में यहां खायी जा रही हैं घास की रोटियां

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हम विकास की दौड़ और मेक इन इंडिया, मेक इन य़ूपी में व्यस्त हैं। लेकिन हमारे घर के बगल में एक बड़े हिस्से को खाने के लिए अनाज मुहैया नहीं हो पा रहा है, इस सचाई से हम बेखबर हैं। अखिलेश सरकार यह मान कर चल रही है वह शौकिया घास की रोटी खा रहे हैं। और इस बहाने सरकार ने इन लोगों की किसी भी प्रकार की मदद से भी पल्ला झाड़ लिया है।

कौन हैं यह लोग जिन्हें गेहूं की रोटी अच्छी नहीं लग रही। दूध और दाल जिन्हें नहीं भा रहा है। आइये मिलवाते हैं खेत, खलिहान और जंगल से जुड़े इन लोगों से। ये लोग उत्तर प्रदेश के उस हिस्से के रहने वाले हैं जिनकी बहादुरी के हम गीत गाते हैं। यह है बुंदेलखंड का लडवारी गांव।

bundelkhand-grass-roti-story-650_650x400_61449688525पेट की आग बुझाने को खा रहे हैं घास

किसानों का कहना है कि हमारे पास खाने के लिए कुछ नहीं है इसलिए घास खा रहे हैं। लेकिन तहसीलदार इस बात पर जोर देकर कहते हैं कि ये लोग घास खा रहे हैं, क्योंकि यह इस जनजातीय समुदाय का परंपरागत भोजन है। बता दें कि लडवारी गांव में सहरिया जनजातीय समुदाय की अच्छी खासी तादात है।

‘घास की रोटी यहां का परंपरागत भोजन’
ग्रामीणों का आरोप है कि अधिकारी उन पर यह कहने के लिए दबाव बना रहे हैं कि पत्रकारों ने जबरदस्ती दबाव बनाकर उनसे घास की रोटी बनाने को कहा। लेकिन जब ग्रामीणों ने इस बात से इनकार किया तो तहसीलदार गांव के कुछ पुराने सदस्यों को एफिडेविट पर दस्तखत करने के लिए ले आए, जिसमें लिखा था कि गांव में कोई भुखमरी नहीं है।

क्या कहती हैं तहसीलदार प्रीति जैन

लडवारी गांव तालबेहट तहसील के अंतर्गत आता है। यहां की तहसीलदार प्रीति जैन कहती हैं कि ‘फिकार (घास) की रोटी यहां परंपरागत तौर पर खाई जाती हैं। अन्य चीजों के साथ ही ये इन लोगों के खाने का हिस्सा है।’ यह सच है कि घास की ये कड़वी रोटियां यहां पहले खाई जाती थीं, लेकिन सालों पहले इन्हें नियमित भोजन से हटा दिया गया है। अब इन्हें बुरे वक्त में ही खाया जाता है। घास और खरपतवार खाना इस इलाके में भुखमरी के संकट के और गहराने के संकेत हैं। यह हालात एक के बाद एक फसलों के चौपट होने से बने हैं।

bundelkhand-grass-roti-story-650_650x400_51449688567बच्चों को दाल-दूध भी नहीं दे पा रहे लोग
यहां भोजन के भंडार खाली हो चुके हैं और लोगों ने खाने की आदतों में गंभीर रूप से कमी कर ली है। कई लोगों ने हमें बताया कि वे अब 24 घंटे में तीन की बजाय दो बार ही खाते हैं। यही नहीं दाल और दूध जैसे प्रोटीन के स्रोतों में भी भारी कटौती कर ली गई है। सालों पहले छोड़ी जा चुकी घास की रोटी और खरपतवार की सब्जी खाने की मजबूरी फिर से जिंदा हो गई है, जिससे कुछ हद तक भूख शांत हो रही है।

सुप्रीम कोर्ट कमिश्नर (भोजन का अधिकार) को भी दिखायीं घास की रोटियां

बांदा के नरैनी तहसील के सुलखान पुरवा में सुप्रीम कोर्ट कमिश्नर (भोजन का अधिकार) हर्षमन्दर और डा. सज्जाद हसन के समक्ष ग्रामीणों ने घास  की रोटियां दिखाई। वहां पर महिलाओं ने घास-चोकर-जंगली पत्तियों की रोटियां, बेर और मकुइया दिखाते हुए कहा कि हम लोग ये खाकर जीवन यापन कर रहे है। बच्चे जंगल में बेर बीनकर पेट भर रहे है। भूख से मौत हो रही है, मरने वालो के परिवारों को सरकार की तरफ से कोई आर्थिक मदद नहीं मिल रही है।

भाजपा का आरोप

भाजपा ने बुन्देलखण्ड में जनता की बेहाली और बदहाली पर चिन्ता जताई है। पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता मनोज मिश्र ने सपा सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि बुन्देलखण्ड  के लोग अनाज की जगह घास की रोटियां खाने को मजबूर है। प्रदेश  की सपा सरकार नाच गाने और सैफई में जन्म दिन मनाने में व्यस्त है। उन्होंने कहा कि यूपी की सरकार भूल गई है कि उसकी जिम्मेदारी क्या है?

सपा सरकार अपनी उपलब्धियों का ढोल पीट रही है उस समय बुन्देलखण्ड की जनता भूखों मरने को मजबूर है। पहले रवी की फसल भारी वर्षा ओलावृष्टि फिर खरीफ की फसल पर सूखे की मार तथा वर्तमान में रवी की बुआई कम हुई है। पशुओं को बचाने की समस्या, चारे की कमी और पेयजल समस्या भी बडे पैमाने पर हो गई।

 

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