आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में रोड़ा बन रहा है चीन, गुस्से में है भारत ले रहा है ये ऐक्शन

0

नई दिल्ली: बीते कुछ वर्षों के दौरान जम्मू कश्मीर के अलावा देश के अनेक हिस्सों में हुए अनेक आतंकवादी हमलों में आतंकी संगठन जैश ए मोहम्मद का नाम प्रमुखता से सामने आया है। इस संगठन का नेतृत्व करने वाले मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) द्वारा वैश्विक आतंकवादी घोषित करने की राह में चीन ने एक बार फिर रोड़ा अटका दिया है। बीती 27 फरवरी को अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस ने यूएनएससी में मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करने का प्रस्ताव पेश किया था, जिस पर इस समूह में एक हद तक आम सहमति नजर आ रही थी। लेकिन जैसी कि पहले से आशंका थी, यूएनएससी के स्थायी सदस्य के रूप में मिले वीटो का इस्तेमाल करते हुए चीन ने इस प्रस्ताव को पारित होने से रोक दिया।

पहले भी लगाता रहा है अड़ंगा
यह चौथी बार है जब चीन ने मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित किए जाने की राह में अड़ंगा लगाया है। इससे पहले वर्ष 2017, 2016 और 2009 में भी चीन जैश सरगना को वैश्विक आतंकी घोषित होने से बचा चुका है। वर्ष 2017 में चीन ने मसूद के बचाव में तर्क दिया था कि वह बहुत बीमार है और अब सक्रिय नहीं है और न ही जैश का सरगना है। सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों में शामिल चीन अब तक यह कहता आया है कि मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं।

वहीं पुलवामा हमले के बाद वैश्विक आक्रोश के मद्देनजर अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस को उम्मीद थी कि इस बार चीन समझदारी से काम लेगा और उनके कदम को बाधित नहीं करेगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। अमेरिका की तरफ से तो इस बार कड़ी चेतावनी भी दी गई थी कि चीन यदि अपने रुख में परिवर्तन नहीं करता है तो क्षेत्रीय स्थिरता और शांति के लिए संकट पैदा हो सकता है। परंतु इस चेतावनी का भी चीन पर कोई असर नहीं हुआ और एक बार फिर उसने अपने पुराने रुख को कायम रखा।

क्यों जरूरी है चीन की मंजूरी

अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के इस समय ये कुल पांच स्थायी सदस्य हैं। नियमों के मुताबिक परिषद में कोई भी प्रस्ताव इन पांचों सदस्यों की सहमति के बिना पारित नहीं हो सकता। इन सभी सदस्यों को वीटो की तकनीकी शक्ति मिली हुई है, जिसके जरिये वे किसी भी प्रस्ताव को असहमत होने की स्थिति में रोक सकते हैं। चीन अपने इसी अधिकार का दुरुपयोग करते हुए न केवल मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित होने से रोकता है, बल्कि इस परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता की राह में भी अड़ंगा लगाता रहा है। शेष चारों सदस्य सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता पर सहमत हैं, परंतु चीन की चालबाजी के कारण भारत को अब तक इस सदस्यता से वंचित रहना पड़ा है। इसे दुर्योग ही कहेंगे कि आज जिस यूएनएससी की स्थायी सदस्यता के बलबूते चीन भारत के लिए कई मोर्चों पर परेशानी बना हुआ है, आजादी के बाद वह सदस्यता भारत को मिल रही थी, लेकिन देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के कारण वह चीन के पास चली गई। गौरतलब है कि वर्ष 1953 में सोवियत संघ द्वारा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का प्रस्ताव भारत के समक्ष रखा गया था, नेहरू ने उस सदस्यता को लेने से इन्कार कर दिया।

इस बारे में कांग्रेस के ही वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने अपनी किताब ‘नेहरू : द इनवेंशन ऑफ इंडिया’ में लिखा है, ‘जिन भारतीय राजनयिकों ने उस दौर की विदेश मंत्रालय की फाइलों को देखा है, वे इस बात को मानेंगे कि नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र के स्थायी सदस्य बनने की पेशकश को ठुकरा दिया था।’ यहां तक कि रूस ने भारत के लिए छठी सीट बनाने तक की बात की थी, लेकिन नेहरू पहले चीन का मामला हल करने के लिए प्रयासरत रहे। नेहरू की परवर्ती कांग्रेसी सरकारों का रुख भी इस मामले में ढीला-ढाला ही रहा और अंतत: 1971 में चीन को सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता दे दी गई। जाहिर है इस मामले में नेहरू के दूरदर्शी नहीं होने के कारण भारत संयुक्त राष्ट्र का स्थायी सदस्य बनने से वंचित रह गया और इस कारण आज दशकों बाद तक यह परिघटना देश के लिए परेशानी का सबब बनी हुई है। सैकड़ों निर्दोषों की जान बचाने के लिए मसूद अजहर को रिहा करने के कारण आज भारतीय जनता पार्टी की सरकार पर सवाल उठाने वाली कांग्रेस को नेहरू की इस कूटनीतिक विफलता पर भी एक नजर जरूर डालनी चाहिए।

बनानी होगी कूटनीतिक बढ़त
बहरहाल अगर भारत चाहे तो कूटनीतिक रूप से चीन को घेरने का यह बहुत ही सही अवसर है। सुरक्षा परिषद में मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित किए जाने के प्रस्ताव का विरोध करने के कारण इस बार चीन उसके शेष सदस्य देशों को नाराज कर बैठा है। भारत को इस अवसर का लाभ लेते हुए उसे वैश्विक मंचों पर घेरने की भरपूर कोशिश करनी चाहिए। चीन की इस हरकत को आतंकवाद को प्रश्रय देने के रूप में विश्व पटल पर प्रचारित और स्थापित करना भारतीय कूटनीति का वर्तमान में बड़ा लक्ष्य होना चाहिए।

उचित होगा कि भारतीय जांच एजेंसियां और ख़ुफिया ब्यूरो आदि मिलकर इस विषय में चीनी भूमिका की गुप्त जांच करें और उसकी संलिप्तता पाए जाने पर, उसे साक्ष्य समेत विश्व समुदाय के सामने लाकर, चीन के ढोंगी चरित्र का पर्दाफाश करें। अगर भारत दुनिया को यह संदेश देने में कामयाब रहता है कि पाकिस्तान में पनपे आतंकवाद को संरक्षण चीन से मिल रहा है तो यह चीन पर एक बड़ी कूटनीतिक बढ़त होगी। इस प्रकार चीन को विश्व बिरादरी में सामाजिक स्तर पर प्रतिष्ठाशून्य और कमजोर किया जा सकता है।

loading...
शेयर करें