रिपोर्ट : भारत में बेटों की चाह में पैदा हुईं 2.1 करोड़ ‘अनचाही’ लड़कियां

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नई दिल्ली। देश में लगभग दो करोड़ 10 लाख बेटियां ऐसी हैं जिन्हें उनके माता-पिता जन्म नहीं देना चाहते थे। यानी उनके माता-पिता को चाहत तो बेटे की थी लेकिन उसकी जगह अनचाही बेटियों का जन्म होता गया। देश में पहली बार अपनी तरह का यह आकलन सामने आया है। वह भी सरकारी स्रोत से।

इस सर्वे में अनचाही लड़कियों की संख्या 21 मिलियन यानी 2 करोड़ 10 लाख बताई गई है। यह संख्या सेक्स रेसियो ऑफ लास्ट चाइल्ड (एसआरएलसी) के आधार पर बताई गई है। इससे यह साफ जाहिर होता है कि माता-पिता तब तक लड़कियों को पैदा करते हैं जब तक की लड़का न हो जाए।

इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक, यह आंकड़े नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी की विकास अर्थशास्त्री सीमा जयचंद्रन द्वारा 2017 में प्रकाशित कागजात के एक समूह पर आधारित हैं। इसमें यह भी बताया गया है कि बेटे की चाहत गर्भपात का कारण नहीं है।

देश में जन्म के समय प्राकृतिक लिंग जानने का अनुपात प्रत्येक लड़की के लिए 1.05 लड़का है। सर्वेक्षण में बताया गया है कि भारत में, आखिरी बच्चे का लिंग अनुपात पुरुष के मुकाबले पहले जन्म के लिए यह 1.82, दूसरे जन्म के लिए 1.55 और तीसरे बच्चे के लिए 1.65 पर है।

यह सर्वेक्षण में इस्तेमाल किए गए 17 लिंग सूचकों में से एक है जो कि संपत्ति में वृद्धि के साथ किसी भी दशक के सुधार को दिखाने में नाकाम रहा है और दूसरा सर्वे ये है कि महिला रोजगार भी प्रभावित हुआ है।

2005-06 और 2015-16 के बीच, वेतन पर काम करने वाली महिलाओं का अनुपात 36 प्रतिशत से घटकर 24 प्रतिशत हो गया है। यह स्पष्ट रूप से बताता है कि भारत इस मामले में कितना धीमा हो गया है। इसके लिए मुख्य कारण जो बताए गए है उसमें से एक यह है कि अवैतनिक कार्य का अधिक से अधिक बोझ जो महिलाओं पर आती है, जिसमें परिवार का देखभाल भी शामिल है।

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