नेपाल के लिए चीन Special One, हम अपनी ही ‘नाकेबंदी’ में फंसे

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काठमांडू। अजीज़ नेपाल के साथ भारत के रिश्‍तों का बीता साल कुछ अच्‍छा नहीं रहा। दुनिया की सबसे लम्‍बी खुली सीमा (1,700 किलोमीटर) के बावजूद संविधान के मुद्दे पर हुई ‘नाकेबंदी’ ने हालात बिगाड़ दिए हैं।

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इन बिगड़ती स्थितियों का फायदा चीन ने उठाया । चीन की एक हफ्ते की यात्रा पर गए नेपाल के उप प्रधानमंत्री कमल थापा ने पेट्रोलियम पदार्थों के आयात के लिए उनसे समझौता कर लिया है।

यह पहली बार है जब नेपाल को चीन इतना पसंद आ रहा है। इसकी वजह भी है। बीते साल भूकंप के बाद नेपाली संसद ने तय किया कि संविधान चार नहीं बल्कि दो साल में ही बना लिया जाएगा।

नेपाल के विदेश मंत्री कमल थापा
नेपाल के विदेश मंत्री कमल थापा

अब संविधान तैयार हुआ तो भारतीय सीमा से जुड़े नेपाली इलाकों में रहने वाली मधेसियों को ये नहीं भाया। विद्रोह की आग ऐसी फैली किे सीमा पर नाकेबंदी जैसे हालात हो गए।

रसोई गैस सिलेण्‍डर की कीमत 10 हजार रुपए हो गई। यहां सब्सिडी हटने की खबर अखबारों में सुर्खियां बन रही थीं। लेकिन पड़ोस के भूखे लोगों पर न कूटनीति के जानकारों की नजर गई, न बुद्धिजीवियों की।

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गैस के बाद पेट्रोल का नंबर आया। नाकेबंदी ने भारत से मिलने वाला हुक्‍का-पानी ही बंद नहीं किया, गाडि़यों के टैंक भी सुखा दिए। दो महीने से नेपाल में पल्‍सर जैसी बाइक्‍स की मांग बढ़ गई है। वजह, बड़े टैंक में जहां से, जिस भी तरह से पेट्रोल मिले,भरपूर भर लो।

नेपाल के विदेश मंत्रालय ने इसे ‘भारत की ओर से अघोषित आर्थिक प्रतिबंध’ कहा है और इसे लेकर नेपाल में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। इन मुश्किलों के दौर में नेपाल में रहने वालों का लगा कि इसकी वजह भारत है। ऐसा है या नहीं, इसका जवाब मांगों तो सब चुप हो जाते हैं। चीन ने इसी चुप्‍पी का फायदा उठा लिया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नरेंद्र मोदी के नेपाल दौरे के बाद भारत की जो लोकप्रियता बढ़ी थी उसमें तेज़ी से कमी आई है।

भारत नेपाल के नए संविधान को लेकर खुले तौर पर ऐतराज़ जता चुका है जबकि चीन ने संविधान स्वीकार किए जाने पर नेपाल को बधाई दी थी।

नेपाल का साथ देते हुए बीते दिनों चीनी राष्ट्रपति ने भारत का नाम लिए बिना कहा है कि बड़े देशों को छोटे पड़ोसी देशों के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

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