नया फैसला और ‘वोटांधता’ की अविरल बीमारी

shutterstock_india_168004598देश की आजादी को साठ साल से ज्यादा हो चुका है। दुनिया में सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का हम दम्भ भरते हैं। लेकिन हमारा लोकतंत्र किस मुहाने पर खड़ा है इसका नमूना या फिर नमूने हम साफ तौर पर देख सकते हैं। खासतौर पर ऐसा उस वक्त और भी साफ हो जाता है जब कोई अप्रत्याशित या चौंकाने वाला फैसला होता है। हमारा समाज या फिर कहे कि लोकतंत्र को चूसने वाले ऐसा कतई बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं।

ताजा फैसलों का उदाहरण दो राज्यों से निकला है। एक दिल्ली और एक हरियाणा। दोनों ही जगह जो फैसले किए गए वो अद्वितीय थे। मेरी नज़र में दोनों फैसलों को 21वीं सदी का फैसला कहा जा सकता है। पहला फैसला दिल्ली की अरविन्द केजरीवाल सरकार ने किया। तय किया गया दिल्ली की सड़कों पर ऑड इवन फार्मूला लागू किया जाए। इस फैसले के पीछे दिल्ली के बढ़ते प्रदूषण को जिम्मेदार बताया गया। बात केवल बताने की नहीं थी हकीकत इससे भी ज्यादा बदरंग और घिनौनी हो चुकी है।

दिल्ली देश की नहीं दुनिया के प्रदूषण का राजधानी बन चुकी है। चीन के बीजिंग में प्रदूषण स्तर 300 माइक्रोग्राम पर क्यूबिक मीटर से ऊपर होने पर हाहाकार मच गया था। अलर्ट जारी हो गया था और स्कूलों-ऑफिसों में छुट्टियां कर दी गई थी। दिल्ली में प्रदूषण का स्तर 650 माइक्रोग्राम पर क्यूबिक मीटर से ऊपर रहना आम बात है। इतना होने पर भी यहां कुछ नहीं होता। यहां होता है सरकार के फैसले का विरोध। लोग अपनी सुविधाओं के लिए इतने अड़ियल हो चुके हैं कि उन्हें किसी की परवाह नहीं। नुकसान उनको भी हो रहा है। वो ये जानते भी हैं। लेकिन लोकतंत्र में मिली आजादी के नाम पर होने वाली सियासत अंधी हो चुकी है। या फिर कहे कि उनको ‘वोटांधता’ की बीमारी लग चुकी है। फैसला लागू होने से पहले ही इतने सवाल खड़े किये जा रहे हैं कि जैसे मुसीबत का न जाने कितना बड़ा पहाड़ दिल्ली के लोगों पर टूटने जा रहा है।

दूसरा फैसला किया हरियाणा की सरकार ने। यहां बीजेपी की खट्टर सरकार का राज चल रहा है। यहां भी एक नए जमाने का फैसला किया गया। फैसला ये था कि लोकतंत्र की सबसे पहली पायदान यानि पंचायत के चुनावों में केवल पढ़े लिखे लोगों को ही चुनाव लड़ने का मौका दिया जाए। आजादी के इतने साल के बाद आए एक बड़े फैसले का विरोध भी ‘वोटांधता’ की बीमारी की वजह से हो रहा है। कुछ नया न देखने वाले अपने पुराने तर्क रख रहे हैं। इनमें तर्क कम कुतर्क की बदबू ज्यादा आ रही है। 21 सदी में  सियासत चमकाने वालों का नज़रिया इस मामले में 18 सदी का है। उनका कहना है कि इससे दबे कुचले लोगों का हक मारा जाएगा। अपने समाज में एक पढ़ा-लिखा पंच या फिर मुखिया को देखने से पहले ही सियासत का राग दरबारी शुरू हो गया।

इसमें कोई शक नहीं कि दोनों ही फैसलों को अगर पहली नज़र में देखा जाए, और ईमानदारी से देखा जाए। तो देश की दिशा तय में इनका बड़ा रोल हो सकता है। लेकिन लोकतंत्र में लोगों को मिली जरूरत से ज्यादा आजादी और सियासत की ‘वोटांधता’ दोनों ही फैसलों को गिराने पर तुली हुई हैं। एक बात हमें और नहीं भूलना चाहिए। हमारे देश ने हमें वोट डालने का ऐसा हथियार दिया है जिसके जरिए किसी भी सत्ता को बेदखल कर सकते हैं, लेकिन इस बात का हक हमे उनको भी देना पड़ेगा कि देश और समाज के हित में कोई भी बड़ा फैसला वो बेधड़क ले सकें।

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