भारत में नदियों को जोड़ने का इंटरलिंकिंग परियोजना

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डा. राधेश्याम द्विवेदी

परियोजना की अवधारणा :- हमारी नदियों का काफी पानी समुद्र में चला जाता है और उसे यदि रोक लिया गया तो पानी की प्रचुरता वाली नदियों से पानी की कमी वाले क्षेत्रों में पानी पहुंचाया जा सकेगा, जिससे देश के हरेक भाग में हर किसी को समुचित जलापूर्ति हो पाएगी। लेकिन हाल के आंकड़े बताते हैं कि नहरों, तालाबों, कुओं और नलकूपों से एकत्र पानी का महज पांच प्रतिशत हिस्सा ही घरेलू उपयोग में लाया जाता है। नदियों को जोड़ने की अवधारणा यानी इंटरलिंकिंग आमजन एवं नीति-निर्माताओं के एक अच्छे-खासे हिस्से को अपील करती रही है। तीन दशक से ज्यादा हुए, जब के.एल. राव ने गंगा एवं कावेरी को जोड़ने का सुझाव दिया था। इस सुझाव का हामी दस्तूर प्लान का गार्डेन कैनाल बना, जिसमें देश की सभी प्रमुख नदियों को जोड़ने की बात कही गई थी। दोनों ही सुझावों ने लोगों का ध्यान आकृष्ट किया है।

परियोजना का इतिहास :- नदियों को जोड़ने की परियोजना नई नहीं है. 1858 में सर आर्थर थॉमस कार्टन ने विदेशी माल ढुलाई का खर्च कम करने के लिए दक्षिण भारत की नदियों को जोड़ने का सुझव दिया था। इसके बाद, सन 1972 में डॉ. के एल राव ने गंगा और कावेरी नदी को जोड़ने का सुझाव दिया। लगभग 30 सालों तक प्रस्ताव विचार एवं परीक्षण के दौर से गुजरा और अंतत: आर्थिक तथा तकनीकी आधार पर अनुपयुक्त होने के कारण खारिज हुआ। नदी जोड़ परियोजना की चर्चा 1980 में भी हुई। एचआरडी मिनिस्ट्री ने एक रिपोर्ट तैयार की थी। नेशनल परस्पेक्टिव फॉर वॉटर रिसोर्सेज डेवलपमेंट नामक इस रिपोर्ट में नदी जोड़ परियोजना को दो हिस्सों में बांटा गया था- हिमालयी और दक्षिण भारत का क्षेत्र। 1982 में इस मुद्दे पर नेशनल वॉटर डेवलपमेंट एजेंसी के रूप में एक्सपर्ट्स की एक ऑर्गनाइजेशन बनाया गया। इसका काम यह स्टडी करना था कि पेनिन्सुला की नदियों और दूसरे जल संसाधनों को जोड़ने का काम कितना प्रैक्टीकल है। एजेंसी ने कई रिपोर्ट्स दीं, लेकिन बात वहीं की वहीं अटकी रही। उन्नीस सौ नब्बे के दशक में सरकार ने नदियों को आपस में जोड़ने की संभाव्यता के साथ-साथ जल संसाधन विकास की रणनीति की जांच के निमित्त एक आयोग का गठन किया। आमजन के लिए अनुपलब्ध इसकी रिपोर्ट में इसके समर्थन की बात के साथ इस सतर्कता पर जोर डाला गया है कि नदियों को जोड़कर जलाधिक्य वाले क्षेत्र से जलाभाव वाले क्षेत्र में अतिरिक्त जल को भेजने से पूर्व सभी संबंधित पहलुओं पर भली-भांति विचार कर लिया जाए।

2002 में वाजपेयी ने पहल की :- अक्टूबर 2002 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार ने सूखे व बाढ़ की समस्या से छुटकारे के लिए भारत की महत्वपूर्ण नदियों को जोड़ने संबंधी परियोजना को लागू करने का प्रस्ताव लाई थी. उस समय गुजरने के साथ इन डेढ़ सौ वर्षों में भी नदियों को आपस में जोड़ने की अवधारणा सिरे नहीं चढ़ सकी। केंद्र ने नदियों को आपस में जोड़ने की व्यावहारिकता परखने के लिए एक कार्यदल का गठन किया। इसमें भी परियोजना को दो भागों में बांटने की सिफारिश की गई। पहले हिस्से में दक्षिण भारतीय नदियां शामिल थीं जिन्हें जोड़कर 16 कड़ियों की एक ग्रिड बनाई जानी थी। हिमालयी हिस्से के तहत गंगा, ब्रह्मपुत्र और इनकी सहायक नदियों के पानी को इकट्ठा करने की योजना बनाई गई।

सर्वोच्च न्यायालय का केन्द्र को निर्देश :- 2002 में जनहित याचिका दायर हुई। उस पर उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए सुझाव के अनुसार एनडब्ल्यूडीए ने देश की 37 प्रमुख नदियों को जोड़ने का प्रस्ताव तैयार किया। अनुमान लगाया गया है कि नदी जोड़ों योजना के पूरा होने पर 25.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र (17 लाख हेक्टेयर हिमालय क्षेत्र में और 8.5 लाख हेक्टेयर दक्षिण भारत में) में सूखे का असर कम होगा। बहरहाल, मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा, ‘नदियों को आपस में जोड़ने के विषय पर 8 फरवरी को एक उच्च स्तरीय बैठक बुलाई गई थी जिसमें इसके विभिन्न आयामों एवं इस दिशा में हुए काम की प्रगति पर विचार किया गया। इसके तहत दमन गंगा पिंजाल लिंक नहर के साथ ही ताप्ती नर्मदा लिंक नहर पर भी काम को आगे बढाया गया है। इसके साथ ही पंचेश्वर सारदा लिंक नहर पर भी काम किया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि केन बेतवा नदी जोड़ो परियोजना को पहले सिंतबर तक शुरू होना था लेकिन पर्यावरण एवं वन मंजूरी के विषय को लेकर इसकी अवधि को बढ़ा कर दिसंबर कर दिया गया हालांकि अभी तक यह शुरू नहीं हो पाई है।

उच्चाधिकार समिति का गठन:– भारत की महत्वपूर्ण नदियों को जोड़ने संबंधी परियोजना के क्रियान्वयन के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति का गठन किया. इस समिति में जल संसाधन मंत्री, जल संसाधन सचिव, वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के सचिव के अलावा चार विशेषज्ञ होंगे. चार विशेषज्ञों में जल संसाधन मंत्रालय, वित्त मंत्रालय, वन एवं पर्यावरण मंत्रालय तथा योजना आयोग से एक-एक विशेषज्ञ नामित किए जाने हैं। समिति में राज्य सरकार की जल एवं सिंचाई विभाग का भी एक प्रतिनिधि होगा और 2 सामाजिक कार्यकर्ता तथा एक सर्वोच्च न्यायालय के वकील रंजीत कुमार सदस्य होंगे। सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि नदी जोड़ो परियोजना को समयबद्ध तरीके के साथ लागू किया जाए.सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति एसएच कपाडिया, न्यायमूर्ति ए.के. पटनायक व न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार की पीठ ने 27 फरवरी 2011 को नदियों को जोड़ने संबंधी परियोजना के निर्णय में स्पष्ट किया कि न्यायालय के लिए संभव नहीं है कि वह परियोजना की संभावनाओं व अन्य तकनीकी पहुलुओं पर निर्णय कर पाए. सर्वोच्च न्यायालय की पीठ के अनुसार यह काम विशेषज्ञों का है, साथ ही यह परियोजना राष्ट्र हित में है, क्योंकि इससे सूखा प्रभावित लोगों को पानी मिलेगा।

सर्वोच्च न्यायालय की पीठ के निर्णय के अनुसार गठित समिति नदी जोड़ो परियोजना के क्रियान्वयन की संभावनाओं पर विचार करेगी और उसे लागू करेगी। इस समिति को कम से कम दो माह में एक बैठक जरूर करनी पड़ेगी। किसी सदस्य के अनुपस्थित रहने पर बैठक निरस्त नहीं की जा सकेगी. समिति को साल में दो बार कैबिनेट को रिपोर्ट सौंपनी पड़ेगी. और कैबिनेट उस रिपोर्ट पर जल्दी से जल्दी (अधिकतम 30 दिनों में) निर्णय लेगी. सर्वोच्च न्यायालय ने प्रमुख नदियों को जोड़ने की योजना तैयार कर उसे 2015 तक क्रियान्वित करने का केन्द्र को निर्देश दे डाला। इसके परिणामस्वरूप प्रधानमंत्री ने न्यायालय के निर्देश के अनुपालन के केन्द्र सरकार के फैसले की घोषणा करते हुए 2015 तक इस योजना का क्रियान्वयन सुनिश्चित करने के लिए एक कार्यबल की नियुक्ति की है। श्री सुरेश प्रभु के नेतृत्व में यह कार्यबल सक्रिय भी हो गया है। यह धारणा कि हर किसी तक समुचित और सुरक्षित जलापूर्ति को सुनिश्चित करने के लिए नदियों को आपस में जोड़ना जरूरी है, निहायत ही अनुचित है। हाल के आंकड़े बताते हैं कि नहरों, तालाबों, कुओं और नलकूपों से एकत्र पानी का महज पांच प्रतिशत हिस्सा ही घरेलू उपयोग में लाया जाता है। निस्संदेह जरूरतें दिनानुदिन बढ़ रही हैं, मगर इसके अन्य दूसरे उपयोगों की तुलना में अभी भी यह कम ही रहेगी।

60 नदियों को जोड़ने का प्लान :- योजना के पहले फेज को मोदी मंजूरी दे चुके हैं। प्लान के तहत गंगा समेत देश की 60 नदियों को जोड़ा जाएगा। सरकार को उम्मीद है कि ऐसा होने के बाद किसानों की मानसून पर निर्भरता कम हो जाएगी और लाखों हेक्टेयर जमीन पर सिंचाई हो सकेगी। बीते दो सालों से मानसून की स्थिति अच्छी नहीं रही है। भारत के कुछ हिस्सों समेत बांग्लादेश और नेपाल बाढ़ से खासे प्रभावित रहे हैं। सूत्रों की मानें तो नदियों को जोड़ने से हजारों मेगावॉट बिजली पैदा होगी।

पहले फेज में क्या होगा :- केन नदी पर एक डैम बनाया जाएगा। 22 किमी लंबी नहर के जरिए केन को बेतवा से जोड़ा जाएगा। केन-बेतवा मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के एक बड़े हिस्से को कवर करती हैं। बीजेपी नेता संजीव बालियान के मुताबिक, “हमें रिकॉर्ड वक्त में क्लीयरेंस मिल गया है। अंतिम दौर के क्लीयरेंस भी इस साल के अंत तक मिल जाएगा। केन-बेतवा लिंक सरकार की प्रायोरिटी में है।” सरकार पार-तापी को नर्मदा और दमन गंगा के साथ जोड़ने की तैयारी कर रही है। अफसरों का कहना है कि ज्यादा पानी वाली नदियों मसलन गंगा, गोदावरी और महानदी को दूसरी नदियों से जोड़ा जाएगा। इसके लिए इन नदियों पर डैम बनाए जाएंगे और नहरों द्वारा दूसरी नदियों को जोड़ा जाएगा। बाढ़-सूखे पर कंट्रोल करने के लिए यही एकमात्र रास्ता है।

नितिन गडकरी की सक्रियता :- केंद्रीय जल संसाधन मंत्री नितिन गडकरी नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रालय का जिम्मा संभालते हुए ही फुल ऐक्शन में दिख रहे हैं। गडकरी ने बुधवार को बताया कि उनका मंत्रालय अगले तीन महीने के अंदर नदियों को जोड़ने की केन-बेतवा संपर्क परियोजना, दमनगंगा- पिंजाल संपर्क परियोजना और पार-तापी-नर्मदा संपर्क परियोजना पर काम शुरू करेगा। गडगरी ने साथ ही बताया कि तीनों परियोजनाओं को जरूरी मंजूरी मिल गई है और वह जल्द ही अंतरराज्यीय विवादों को सुलझाने के लिए संबंधित मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक करेंगे, ताकि अगले तीन महीने के अंदर इन परियोजनाओं पर कार्य शुरू हो सके. राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी सोसाइटी की 31वीं वार्षिक बैठक को संबोधित करते हुए गडकरी ने देश के 13 सूखा प्रभावित और 7 बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के लोगों की हालत पर चिंता जताई।

इसके साथ गडगरी ने उपलब्ध जल को संरक्षित करने और उसे साझा करने के लिए कारगर उपाय विकसित करने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि समुद्र में गिरने वाले 60 से 70 प्रतिशत जल को बचाने के तरीके विकसित करने की जरूरत है। नितिन गडकरी ने इस साथ ही नदियों की गाद निकालने के लिए एक नया व्यापक कानून की मांग की है। उन्होंने अपने मंत्रालय से जुड़े संसदीय सलाहकार समिति की बैठक को बाढ़ प्रबंधन के मुद्दे पर संबोधित करते हुए कहा कि यह नया कानून राज्यों के परामर्श से तैयार किया जाएगा। देश के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के लोगों की दुर्दशा पर चिंता व्यक्त करते हुए गडकरी ने कहा कि देश में बाढ़ की चुनौतियों को प्रभावी ढंग से निपटना जरूरी है। जल संसाधन मंत्री ने साथ ही कहा कि नदियों को जोड़ने और बांधों के निर्माण जैसे कार्यों को भी बाढ़ को कम करने के लिए प्राथमिकता दी जानी चाहिए। गडकरी ने कहा कि हमें अपने देश में बाढ़ के पूर्वानुमान करने वाले नेटवर्क को भी मजबूत करना और सुधारना होगा।

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