जय जवान जय किसान, मरो नहीं, मारो!, आज लाल बहादुर शास्त्री का जन्मदिन है

लाल बहादुर शास्त्री
लाल बहादुर शास्त्री

लखनऊ: जय जवान जय किसान का नारा देने वाले देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का आज 116वां जन्मदिन है. उत्तरप्रदेश के मुग़लसराय में 02 अक्टूबर 1904 को जन्में शास्त्री बेहद ही सरल स्वाभाव और सादगी के प्रतीक थे. किसानों और जवानों के हितैशी रहे लाल बहादुर शास्त्री को 09 जून 1964 में देश का प्रधानमंत्री चुना गया. शास्त्री की सादगी और देशभक्ति को देखते हुए उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया.

शास्त्री का शुरूआती जीवन

लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 02 अक्टूबर 1964 में मुगलसराय के एक कायस्थ परिवार में हुआ था. लाल बहादुर शास्त्री जब महज 18 महीने के थे तब उनके पिता का देहांत हो गया. इसके बाद माँ रामदुलारी शास्त्री को लेकर अपने पिता के घर मिर्जापुर चली गई. लेकिन यहां भी दुखों का पहाड़ तब टूट पड़ा जब कुछ ही दिन बाद शास्त्री के नाना की भी मृत्यु हो गई. इसके बाद माँ रामदुलारी ने अकेले ही शास्त्री का पालन-पोषण किया.

लाल बहादुर शास्त्री
लाल बहादुर शास्त्री

प्राथमिक शिक्षा से शास्त्री तक का सफ़र

ननिहाल में रहते हुए शास्त्री ने प्राथमिक शिक्षा ग्रहण की. इसके बाद पढ़ाई हरिश्चन्द्र हाई स्कूल और काशी विद्यापीठ में हुई. इसी दौरान कशी विद्यापीठ से शस्त्री की उपाधि मिलने के बाद उन्होंने अपने सरनेम श्रीवास्तव को हटाकर अपने नाम के आगे शास्त्री लगा लिया.

राजनीतिक जीवन

अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद शास्त्री भारत सेवक संघ से जुड़ गए, और यही से उनकी राजनीतिक सफ़र की शुरुआत हुई. राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के पदचिन्हों पर चलने वाले शास्त्री ने भारतीय स्वाधीनता संग्राम के सभी आन्दोलनों में हिस्सा लिया. जिनमें से असहयोग आन्दोलन (1921), दांडी मार्च (1930), भारत छोड़ो आन्दोलन (1942) प्रमुख रहे.

दुसरे विश्वयुद्ध में जब गाँधी जी ने करो या मरो का नारा दिया, तो मौके की नजाकत को समझते हुए लाल बहादुर शास्त्री ने बड़ी ही चतुराई से गाँधी जी के नारे को बदलकर ‘मरो नहीं, मारो’ में तब्दील कर दिया. उनके इस नारे से उन्होंने पूरे भारत में अंग्रजों के खिलाफ आन्दोलन को एक नई हवा दे दी. पूरे 11 दिन तक अंडरग्राउंड रहते हुए शास्त्री ने इस काम को अंजाम दिया. लेकिन ठीक 11 दिन बाद 19 अगस्त 1942 को शास्त्री गिरफ्तार कर लिए गए.

इलाहबाद में रहते हुए शास्त्री की नजदीकियां जवाहर लाल नेहरु से बढ़ने लगी. लगातार शास्त्री का कद बढ़ने लगा. देखते ही देखते लाल बहादुर शास्त्री को नेहरु के कैबिनेट में जगह मिल गई और उन्हें गृह मंत्रालय का पदभार सौंप दिया गया.

गृह मंत्रालय से प्रधानमन्त्री कार्यालय

27 मई 1964 को तत्कालीन प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरु का निधन हो गया. इसके बाद शास्त्री की काबिलियत और कार्यकुशलता को देखते हुए 09 जून 1964 में देश के प्रधानमन्त्री की जिम्मेदारी सौंप दी गई. महज 18 महीने के कार्यकाल में शास्त्रीने बढ़-चढ़कर देश सेवा की.

ताशकंद समझौते से संदिग्ध मौत तक का सफ़र

1966 में भारत पकिस्तान में युद्ध हो रहा था. पाकिस्तान के आक्रमण का जवाब देते हुए भारत की सेना ने लाहौर पर हमला बोल दिया. इस आक्रमण को देख अमेरिका ने लाहौर में रह रहे अमेरिकी नागरिकों को बचने के लिए और उन्हें सुरक्षित वहां से निकालने के लिए दोनों देशों से युद्धविराम की मांग की.

रूस और अमेरिका के चहलकदमी के बाद भारत के प्रधानमंत्री को रूस के ताशकंद समझौता में बुलाया गया. इस दौरान शास्त्री ने ताशकंद समझौते की हर शर्तों को मंजूर कर लिया लेकिन पाकिस्तान में जीते गए इलाकों को लौटने से इनकार कर दिया.

अंतर्राष्ट्रीय दवाब के चलते शास्त्री जी को मजबूरन ताशकंद समझौते पर हस्ताक्षर करना पड़ा. लेकिन उन्होंने खुद के कार्यकाल में पकिस्तान की जमीन पर कब्ज़ा छोड़ने से इनकार कर दिया. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री अयूब खान के साथ युद्ध विराम पर हस्ताक्षर करने के कुछ घंटे बाद ही11 जनवरी 1966 की रात प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की संदिग्ध मौत हो गई. उनके मौत का कारण हार्ट अटैक बताया गया.

 

ये भी पढ़े- महात्मा गांधी की 151वीं जयंती, राजघाट पहुंचे राष्ट्रपति और पीएम मोदी ने दी श्रद्धांजलि

ये भी पढ़े- IPL 2020: कोहली और रैना के बाद अब ये भारतीय खिलाड़ी बना पांच हजारी

 

Related Articles