जेटली ने इंदिरा गांधी को बताया तानाशाह, मौलिक अधिकारों के हनन का लगाया आरोप

नई दिल्ली। भाजपा नेता और वित्तमंत्री अरुण जेटली ने बीते दिन रविवार को कांग्रेस को निशाने पर लेते हुए चार दशक पहले देश की प्रधानमंत्री रही इंदिरा गांधी को तानाशाह बताया। 25 जून 1975 को देश में लगाए गए आपातकाल को उन्होंने बेबुनियाद बताते हुए उन्होंने इंदिरा गांधी के इस फैसले को मनमाना करार दिया। इतना ही नहीं उन्होंने यह भी कहा कि उनके इस फैसले की वजह से देश के लोगों के मौलिक अधिकारों का बेवजह हनन किया गया। इंदिरा के इस कदम ने लोकतंत्र को संवैधानिक तानाशाही में तब्दील कर दिया था।

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अरुण जेटली

खबरों के मुताबिक़ रविवार को अरुण जेटली ने 25 जून 1975 को देश में लगाए गए आपातकाल को याद करते हुए फेसबुक पर रविवार इमरजेंसी रिविजिटेड शीर्षक से एक ब्लॉग लिखा।

अपने इस ब्लॉग में उन्होंने उस दौरान इंदिरा गांधी के उठाये गए कदम की आलोचना करते हुए कई बातों से पर्दा उठाया है।

तीन हिस्सों वाली श्रृंखला के पहले भाग में जेटली ने लिखा कि यह इस घोषित नीति के आधार पर एक अनावश्यक आपातकाल था कि इंदिरा देश के लिए अपरिहार्य थीं और सभी विरोधी आवाजों को कुचल दिया जाना था।

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लोकतंत्र को संवैधानिक तानाशाही में बदलने के लिए संवैधानिक प्रावधानों को बेजा इस्तेमाल किया गया। ब्लॉग का दूसरा हिस्सा सोमवार को आने की जानकारी दी गई।

जेटली ने अपने ब्लॉग में उन लम्हों को याद करते हुए लिखा- जून का महीना झुलसाती गर्मी के साथ इतिहास की कुछ दर्दनाक यादों को भी दोहराता है।

25 जून 1975 में को इंदिरा गांधी ने देश पर निरंकुश आपातकाल थोप दिया था। जीवंत लोकतंत्र पर तानाशाही हावी हो गई थी।

इस तानाशाही ने न केवल लोगों के मूल अधिकार निलंबित कर दिए थे, बल्कि उन्हें जीवन के अधिकार से भी वंचित कर दिया था।

यदि हम अपने लोकतांत्रिक जीवन को सुरक्षित रखना चाहते हैं तो हमें आपातकाल के घटनाक्रम को याद कर सबक सीखने होंगे।

उन्होंने लिखा कि इंदिरा सरकार के निर्मम कार्रवाई के खिलाफ वह पहले सत्याग्रही बने और 26 जून 1975 को विरोध में बैठक करने पर गिरफ्तार कर तिहाड़ भेज दिया गया। 25-26 जून की आधी रात में कई प्रमुख विरोधी नेताओं को गिरफ्तार किया गया।

केंद्रीय मंत्री ने लिखा कि उन्हें महसूस ही नहीं हुआ कि वह 22 साल की उम्र में उन घटनाओं में शामिल हो रहे थे जो इतिहास का हिस्सा बनने जा रही थीं। इस घटना ने उनके जीवन का भविष्य बदल दिया।

उन्होंने लिखा कि इंदिरा गांधी 1971-72 में अपने राजनीतिक कॅरियर में शिखर पर थीं। उन्होंने कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं और विपक्षी दलों के गठबंधन को चुनौती दी थी। इंदिरा ने 1971 के आम चुनाव में शानदार जीत हासिल की थी। उनकी राजनीति की विडंबना यह थी कि उन्होंने ठोस और सतत नीतियों के मुकाबले लोकप्रिय नारों को प्राथमिकता दी।

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