Jallianwala Bagh : निहत्थे मासूमों का हत्याकांड, अंग्रेजी प्रशासन की क्रूरता की दास्तां सुनाता है यह दिन

आपने कई बार Jallianwala Bagh की घटना के बारे में सुना तो होगा ही मगर क्या आप जानते हैं कि आज से ठीक 103 साल पहले ऐसा क्या हुआ था कि आज भी जब देश उस घटना को याद करता है तब वह रोंगटे खड़े कर देने वाला दृश्य आँखों के सामने आ जाता है।

नई दिल्ली : भारत के इतिहास में कुछ तारीखें ऐसी हैं जिन्हे कभी नहीं भूला जा सकता है। आपने कई बार Jallianwala Bagh की घटना के बारे में सुना तो होगा ही मगर क्या आप जानते हैं कि आज से ठीक 103 साल पहले ऐसा क्या हुआ था कि आज भी जब देश उस घटना को याद करता है तब वह रोंगटे खड़े कर देने वाला दृश्य आँखों के सामने आ जाता है।

आजादी की लड़ाई में भारतीयों के जान न्योछावर करने के एक से बढ़कर एक उदाहरण हैं। लेकिन, Jallianwala Bagh की घटना कई मामलों में अलहदा है। जहाँ एक तरफ यह घटना एक अंग्रेज जनरल के क्रूरता की हद पार कर जाने की दास्तां सुनाता है। तो वहीं दूसरी ओर भारतीयों में आजादी की छटपटाहट का भी अफसाना है।

Jallianwala Bagh नरसंहार

13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के पर्व पर पंजाब में अमृतसर के जलियांवाला बाग में British Brigadier General Reginald Dyer द्वारा किए गए निहत्थे मासूमों के हत्याकांड से केवल ब्रिटिश औपनिवेशिक राज की बर्बरता का ही परिचय नहीं मिलता, बल्कि इसने भारत के इतिहास की धारा को ही बदल दिया।

एक दिन पहले ही कर दी गई थी Martial law की घोषणा

6 अप्रैल की हड़ताल की सफलता से पंजाब का प्रशासन बौखलाया हुआ था। जिसके चलते पंजाब के दो बड़े नेताओं Satyapal और Dr. Kichlu को गिरफ्तार कर निर्वासित कर दिया गया जिससे अमृतसर में लोगों का गुस्सा फूट पड़ा था। आजादी के आंदोलन की सफलता और बढ़ता जनआक्रोश देख ब्रिटिश राज ने दमन का रास्ता अपनाया।

जैसे ही पंजाब प्रशासन को इस बात की खबर मिली कि 13 अप्रैल को बैसाखी के दिन आंदोलनकारी Jallianwala Bagh में जमा हो रहे हैं, तो उन्होंने ठान ली कि आंदोलकारियों को इस बार सबक सिखाना है। एक दिन पहले ही Martial law की घोषणा कर दी गई थी। पंजाब के प्रशासक ने अतिरिक्त सैनिक टुकड़ी बुलवा ली थी। Brigadier General Dyer के कमान में यह टुकड़ी 11 अप्रैल की रात को Amritsar ​पहुंची।

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निहत्थे मासूमों का हत्याकांड

आंदोलनकारियों के निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार बैसाखी के दिन यानी कि 13 अप्रैल, 1919 को Amritsar के Jallianwala Bagh में एक सभा रखी गई। शहर में कर्फ्यू होने के बावजूद सैकड़ों लोग ऐसे भी थे, जो आस-पास के इलाकों से बैसाखी के मौके पर परिवार के साथ मेला देखने और शहर घूमने आए थे। और सभा की खबर सुनकर वहां तकरीबन 10-15 हजार लोग सभा के शुरू होने तक जमा हो गए थे। तभी इस बाग के एकमात्र रास्ते से Dyer ने अपनी सैनिक टुकड़ी के साथ वहां पोजिशन ली और किसी की जान की परवाह किए बिना गोलीबारी शुरू कर दी।

Jallianwala Bagh में जमा लोगों की भीड़ पर कुल 1,650 राउंड गोलियां चलीं जिसमें सैकड़ों अहिंसक सत्याग्रही शहीद हो गए और हजारों घायल हुए। घबराहट में कई लोग बाग में बने कुएं में ही कूद पड़े। कुछ ही देर में Jallianwala Bagh में बूढ़ों, महिलाओं और बच्चों सहित सैकड़ों लोगों की लाशों का अम्बार लग गया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक यहां 1,000 से भी ज्यादा लोग मारे गए थे। इस बर्बरता ने भारत में ब्रिटिश राज की नींव हिला दी।

Jallianwala Bagh नरसंहार को व्यापक रूप से भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जाता है। जिसने “अंग्रेजी राज” का क्रूर और दमनकारी चेहरा सामने लाया। कई इतिहासकारों का मानना है कि इस घटना के बाद भारत पर शासन करने के लिए अंग्रेजों के “नैतिक” दावे का अंत हो गया। इस घटना ने सीधे तौर पर एकजुट राजनीति के लिए भारतीयों को प्रेरित किया, जिसका परिणाम भारत की स्वतंत्रता के रूप में सामने आया।

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