भारत के सच्चे Hero Neeraj Chopra के सम्मान में 7 अगस्त को होगा Javelin Throw Event….

भारतीय एथलेटिक्स महासंघ ने यह फैसला लिया है कि देश में हर साल 7 अगस्त को जैवलिन थ्रो ईवेंट रखा जाएगा, इसी दिन नीरज चोपड़ा ने भाला फेंक में गोल्ड मेडल जीता था

नई दिल्ली: भारतीय एथलेटिक्स महासंघ (Athletics Federation of India) के योजना आयोग के अध्यक्ष ललित भनोट ने यह बड़ा ऐलान करते हुए बताया कि एथलेटिक संघ की योजना समिति ने फैसला किया है कि लोगों को भाला फेंक (Javelin Throw) के प्रति उत्साहित करने के लिए हम देश में हर साल 7 अगस्त को एक जैवलिन थ्रो ईवेंट (Javelin Throw Event) रखेंगे जिस दिन नीरज चोपड़ा (Neeraj Chopra) ने जैवलिन में गोल्ड मेडल जीता था।

टोक्यो ओलंपिक में भाला फेंक में स्वर्ण पदक (Gold Medalist) विजेता नीरज चोपड़ा भारत पहुंचकर बताया कि नेशनल गेम खेलने के बाद मुझे नेशनल कैंप में लिया गया वह मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा बदलाव था। नेशनल कैंप में जब मैं अपने से बड़े एथलीट को देखता था तो प्रेरणा मिलती थी। उनके बीच होने से एक अलग जज्बा और एहसास होता था।

नीरज चोपड़ा ट्रैक और फील्ड एथलीट प्रतिस्पर्धा में भाला फेंकने वाले खिलाड़ी हैं। नीरज ने 87.58 मीटर भाला फेंककर टोक्यो ओलंपिक (Tokyo Olympics) 2020 में गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रचा है। अंजू बॉबी जॉर्ज के बाद किसी विश्व चैम्पियनशिप स्तर पर एथलेटिक्स में स्वर्ण पदक को जीतने वाले वह दूसरे भारतीय हैं।

भाला फेंक में नीरज चोपड़ा का सफर

नीरज चोपड़ा का जन्म 24 दिसंबर 1997 को हरियाणा (Haryana) राज्य के पानीपत शहर के एक छोटे से गांव खांद्रा में एक किसान रोड़ समुदाय में हुआ था। नीरज के परिवार में इनके पिता सतीश कुमार पेशे से एक छोटे किसान हैं और इनकी माता सरोज देवी एक गृहणी है। भाला फेंक जैवलिन थ्रो (Javelin Throw) में नीरज की रुचि तब ही आ चुकी थी जब ये केवल 11 वर्ष के थे और पानीपत स्टेडियम में जय चौधरी को प्रैक्टिस करते देखा करते थे।

नीरज चोपड़ा एक भारतीय एथलिट (Indian Athlete) हैं, जो ट्रैक एंड फील्ड के जेवलिन थ्रो नामक गेम से जुड़े हुए हैं और राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करते हैं। नीरज एक एथलीट होने के साथ-साथ भारतीय सेना में सूबेदार पद पर भी तैनात हैं और सेना में रहते हुए अपने बेहतरीन प्रदर्शन के बदौलत इन्हे सेना में विशिष्ट सेवा मैडल से भी सम्मानित किया जा चूका है।

भाला फेंक का इतिहास

भाला फेंक एक ट्रैक और फील्ड इवेंट है जहां भाला, लगभग 2.5 मीटर यानी की 8 फीट 2 इंच लंबा भाला को फेंका जाता है। भाला फेंकने वाला एक पूर्व निर्धारित क्षेत्र के भीतर दौड़कर गति प्राप्त करता है। 708 ईसा पूर्व में पेंटाथलॉन के हिस्से के रूप में भाला फेंक को प्राचीन ओलंपिक खेलों (Olympic Games) में जोड़ा गया था। इसमें दो घटनाएं शामिल थीं, एक दूरी के लिए और दूसरी लक्ष्य को मारने में सटीकता के लिए।

1870 के दशक की शुरुआत में जर्मनी और स्वीडन में भाला जैसे डंडे को लक्ष्य में फेंकना शुरू किया गया था। स्वीडन में ये ध्रुव आधुनिक भाला में विकसित हुए और उन्हें दूरी के लिए फेंकना वहां और फिनलैंड में 1880 के दशक में एक आम घटना बन गई। अगले दशकों में नियम विकसित होते रहे। मूल रूप से भाला बिना किसी रन-अप के फेंका जाता था और गुरुत्वाकर्षण के केंद्र में उन्हें पकड़कर पकड़ना हमेशा अनिवार्य नहीं होता था। सीमित रन-अप 1890 के दशक के अंत में पेश किए गए और जल्द ही आधुनिक असीमित रन-अप में विकसित हुए।

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