जीवा आयुर्वेद भारतीय चिकित्सा प्रणाली को वैश्विक मान्यता दिलाना चाहता

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नई दिल्ली| जीवा आयुर्वेद प्राचीन भारतीय चिकित्सा प्रणाली को वैश्विक मान्यता दिलाने के प्रयास के तहत नैदानिक मसविदा (डायग्नोस्टिक प्रोटोकॉल) बनाना चाहती है। इस प्रोटोकॉल को सोमवार को लांच किया जाएगा। जीवा देश भर में 80 क्लीनिक एवं अस्पताल चलाती है।

जीवा आयुर्वेद
जीवा आयुर्वेद के निदेशक मधुसूदन चौहान ने कहा, “आयुर्वेद उद्योग लंबे समय से पुरानी चिकित्सा परंपरा को बदलने के लिए प्रोटोकॉल चाहता है, जो दुनिया में व्यापक स्वीकृति के लिए पुरानी चिकित्सा प्रणाली के लिए आंकड़े व साक्ष्य आधारित चिकित्सा प्रणाली से संचालित हो।”

जीवा आयुर्वेद ने पिछले दशक में सामने आए दो लाख मरीजों के परामर्श रिकॉर्ड के विश्लेषण के बाद प्रोटोकॉल बनाए हैं। जीवा ने निष्कर्ष निकाला है कि इसकी प्रैक्टिस को मानकीकृत किया जा सकता है, लेकिन इलाज को नहीं।

उन्होंने कहा, “एलोपैथी के विपरीत, आयुर्वेद मूल रूप से चिकित्सा की व्यक्तिगत प्रणाली है। आयुर्वेद एक बहुत अधिक विकसित विज्ञान है। यहां एक ही दवा उसी लक्षण के लिए कार्य नहीं करती है। व्यक्तिगत चिकित्सा जीनोमिक्स पर आधारित होती है और मानव स्वास्थ्य के प्रणाली को देखना अब एलोपैथी में फैशन बन गया है, जबकि आयुर्वेद इन अवधारणाओं के चारों ओर बनाया गया है।”

आयुर्वेद अब भी बहुत से देशों में चिकित्सा विज्ञान के रूप में स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि वैज्ञानिक समुदाय आंकड़ों व साक्ष्य के बारे में सवाल करता है–जैसे किस आधार पर दवाएं दी जाएं और इसका प्रभाव कैसे साबित होगा।

चौहान ने कहा कि आयुर्वेद के पास आंकड़े व साक्ष्य नहीं हैं।

जीवा आयुर्वेद ने 1992 में फरीदाबाद में अपना मुख्यालय बनाया। जीवा आयुर्वेद में 350 चिकित्सक व 400 हेल्थकेयर पेशेवर हैं। यह प्रोटोकॉल विकसित करने के लिए 2009 से आंकड़े एकत्र कर रहा है।

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