जस्टिस रुथ बेडर ने लैंगिक भेदभाव के खिलाफ हमेशा आवाज बुलंद की

जस्टिस रुथ बेडर गिंसबर्ग
 जस्टिस रुथ बेडर गिंसबर्ग

वाशिंगटन:जस्टिस रुथ बेडर गिंसबर्ग हमेशा से लिंग भेदभाव के खिलाफ रही. लेकिन क्या आप जानते है उनके मन में ये सोच कब से घर कर गई. 1963 में रटगर्स लॉ स्कूल में जब उन्हें लॉ प्रोफेसर के तौर पर नियुक्त किया गया तब उनसे ये कहा गया कि आपको पुरुष सहयोगियों के मुकाबले तनख्वाह कम दी जाएगी क्योकि आपके पति के पास पहले से ही एक अच्छे तनख्वाह वाली नौकरी है. लिंग भेदभाव का आलम ये था कि जब गिन्सबर्ग ने अकादमिक क्षेत्र में कदम रखा तब पूरे अमेरिका में उन्हें मिलाकर बस 20 महिला प्रोफेसर ही मौजूद थी. बस यही से बेडर की ज़िन्दगी ने एक नया रुख ले लिया. इसके बाद गिन्सबर्ग इस भेदभाव को खत्म करने के लिए हर संभव प्रयास करने लगी.

जस्टिस रुथ बेडर गिंसबर्ग
 जस्टिस रुथ बेडर गिंसबर्ग

मानव आधिकारों और लैंगिक समानता के लिए हर मंच पर अपनी बेबाक राय रखने वाली गिंसबर्ग का मानना था कि समाज का लिंग के आधार पर बटना काफी दुर्भाग्यपूर्ण है. निडर बेबाक रुथ बेडर ने एक ऐसे वक़्त में लिंग समानता का मुद्दा उठाया था जब पूरा विश्व पुरुष प्रधान हुआ करता था.

उनका कहना था की मेरी माँ से मुझे खुद के दम पर खड़े होने का साहस मिला. मेरी माँ कहती थी ससक्त महिला बनो, जिसका मतलब था कि आत्मनिर्भर होकर जीवन जियो.गिन्सबर्ग का मानना था कि महिलाओं को पुरुषों के कंधे से कंधा मिलकर समाज को चलाने का पूरा हक है. एक महिला ये खुद चुने की उसके लिए क्या सही और क्या गलत है, इसपर किसी और का नियंत्रण नहीं होना चाहिए.

जस्टिस रुथ बेडर गिंसबर्ग
जस्टिस रुथ बेडर गिंसबर्ग

वो अक्सर कहती थी महिला को समाज में समानता मिलनी चाहिए और ये तब ही हो पायेगा जब पुरुष महिलाओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर समाज का विकास करेंगे. अपने 87 साल के जीवन में रुथ ने नारी सशक्तिकरण के हर प्रयास किये. समाज में उनके द्वारा किये गए प्रयास का काफी गहरा असर पड़ा.

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