नए दौर में पुराने तरीके की सियासत करेंगे कमलनाथ

मध्य प्रदेश। कांग्रेस की मध्य प्रदेश इकाई के अध्यक्ष कमलनाथ नए दौर में पुराने तरीके की सियासत के जरिए जननेता बनने निकले हैं, एक तरफ तो वे जनता से आशीर्वाद मांगने न जाने की बात कहते हैं, तो दूसरी ओर उनके लिए हर किसी नेता व कार्यकर्ता से मुलाकात कर पाना संभव नहीं है।

कमलनाथकमलनाथ का यह नजरिया उन्हें जनता के करीब जाने से रोक रहा है और पूरे प्रदेश में उनकी स्वीकार्यता नहीं बन पा रही है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में वही नेता वास्तव में जननेता बन पाता है जो जनता से लेकर अपने कार्यकर्ता की बात सुनने के साथ मेल-मुलाकात में भरोसा करता है और हर किसी से संवाद में उसे हिचक या परहेज नहीं होता। नेता और कार्यकर्ता के बीच मध्यस्थों की कोई भूमिका नहीं होती। लेकिन, कमलनाथ के लिए ऐसा कर पाना मुश्किल हो रहा है।

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की प्रदेश में चल रही जन आशीर्वाद यात्रा पर तंज कसते हुए कमलनाथ कहते हैं कि शिवराज आशीर्वाद खरीदने निकले हैं, वे (कमलनाथ) जनता के पास आशीर्वाद मांगने नहीं जाएंगे, बल्कि प्रदेश की जनता उन्हें आशीर्वाद देने आएगी।

कमलनाथ का यह बयान विवादों में घिर गया है। हर तरफ से सवाल उठे कि जनता के बीच नहीं जाएंगे तो चुनाव कैसे जीतेंगे। जनता का सहयोग या आशीर्वाद मिले बिना कोई व्यक्ति जननेता बन नहीं सकता और न ही अपने दल को चुनाव जिता सकता है। नेता को तो जनता के बीच जाना होगा, वह चाहे सभाएं करे, यात्रा निकाले या कोई दूसरे तरीके अपनाए।
वहीं, कमलनाथ और कार्यकर्ताओं की बीच की दूरी पर उनका अपना ही तर्क है। वे कहते हैं कि उनके लिए हर किसी से मुलाकात कर पाना संभव नहीं है। वे दिन में 100-150 लोगों से रोज मिलते हैं, हर रोज किसी एक व्यक्ति से वे मुलाकात नहीं कर सकते। मेल-मुलाकात के लिए व्यवस्था बनाना होती है, उसी के मुताबिक काम हो सकता है। कांग्रेस की प्रदेश इकाई में हावी होते कॉर्पोरेट कल्चर पर वे इसे भाजपा का दुष्प्रचार कहते हैं।

राजनीतिक विश्लेषक गिरिजा शंकर का कहना है कि कमलनाथ कभी भी राजनेता तो रहे नहीं, उनकी राजनीति का एक अपना अंदाज है, उसी के मुताबिक वे अब भी चल रहे हैं। जन नेता वही बन पाया है, जिसने जनता और समाज के मूड को समझा है और उसी के मुताबिक अपने को ढाला है। कमलनाथ ऐसा नहीं कर पाए हैं। उसकी वजह भी है, वे चार दशक से जिस तरह की राजनीति कर रहे हैं उसमें बदलाव ला पाना उनके लिए आसान नहीं है।

वे आगे कहते हैं कि कांग्रेस और कमलनाथ दोनों के लिए एक बड़ी समस्या यह बन गई है कि वे यह नहीं समझ पा रहे हैं कि विरोधी दल को किस मुद्दे पर विरोध करना है और किसे फॉलो करना चाहिए। वे तो सिर्फ विरोध के लिए विरोध करते हैं, जिसके चलते उनकी ओर से कई बार जनविरोधी बयान भी आ जाते हैं।

कांग्रेस के बुजुर्ग नेता अपना नाम न जाहिर करने की शर्त पर कहते हैं कि यह नेहरू, इंदिरा या अटल बिहारी वाजपेयी का दौर नहीं है, जब कार्यकर्ता और आमजन उनको सुनने के लिए सभाओं में जमा होता था, घंटों इंतजार करते थे। उस दौर के नेताओं में कुछ नैतिकता थी और उनकी बात में वजनदारी हुआ करती थी, अब वैसा कुछ नहीं है।

कमलनाथ को वर्तमान राजनीति के तौर-तरीके समझकर ही बयान देना चाहिए। अब हर दल को भीड़ जुटाना पड़ती है। वे पुराने नेता हैं, अब सियासी अंदाज बदल गए हैं।

कांग्रेस में एक तरफ राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा तैनात किए गए पदाधिकारी गांव-गांव जाकर लोगों से संवाद कर उनकी नब्ज टटोलने की कोशिश में जुटे हैं, दूसरी ओर प्रदेश अध्यक्ष की कार्यशैली उनसे जुदा है। इन हालातों में कांग्रेस के कार्यकर्ता और नेताओं में यह भरोसा ही पैदा नहीं हो पा रहा है कि अगर पार्टी जीत भी गई तो उनकी क्या हैसियत और अहमियत रहेगी। उनके दिमाग में सिर्फ यही सवाल उठ रहे हैं कि जब चुनाव से पहले यह हाल है तो बाद में क्या होगा।

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