जानिए Muharram का इतिहास और मुसलमानों के लिए इसकी अहमियत

लखनऊ : रमजान के बाद इस्लाम का दूसरा सबसे पवित्र महीना माना जाता है, Muharram । जिसे पैगंबर मोहम्मद ने अल्लाह का पवित्र महीना’ कहा है।  इस साल मुहर्रम की शुरुआत 11 अगस्त से  होने की उम्मीद है। बेहद अहमियत का महीना होने के साथ-साथ यह इस्लामिक हिजरी  कैलेंडर का पहला महीना भी है।

Muharram नहीं है उत्सव, बेहद गलत है यह धरना

622 ईस्वी में, इस्लामी हिजरी कैलेंडर तब शुरू हुआ जब पैगंबर मोहम्मद और उनके साथियों को मक्का छोड़कर मदीना जाने के लिए मजबूर किया गया था। इस कड़ी में पैगंबर मोहम्मद और उनके साथियों को भी मक्का में इस्लाम के संदेश को फैलाने से रोका गया और इसी वजह से उन्हें उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। आज इस घटना को 1,443 साल हो चुके हैं।

 

भले ही कई देश इस्लामी कैलेंडर की शुरुआत को मार्क करने के लिए पब्लिक हॉलिडे की घोषणा करते हैं, लेकिन कहीं भी कोई समारोह आयोजित नहीं किया जाता है। मुहर्रम के महीने के बारे में सबसे बड़ी गलत धारणा यह है कि कई बार लोग इसे उत्सव का महीना मान लेते हैं जबकि इस महीने में इसके ठीक विपरीत होता है। सुन्नियों के अलावा इस्लाम के एक संप्रदाय शिया मुसलमानों के लिए यह महीना विशेष महत्व रखता है।

इस महींने की दसवीं तारीख को हजरत अली के बेटे और पैगंबर मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन मुहर्रम को  कर्बला में शहीद कर दिया गया था। पूरी दुनिया में इस दिन को आशूरा के रूप में जाना जाता है, और दुनिया भर के शिया मुसलमान इस पवित्र महीने के पहले 10 दिनों में इमाम हुसैन की शहादत पर शोक मनाते हैं। इस के बाद घरों में मजलिसों का सिलसिला शुरू हो जाता है जो दो महीने तक जारी रहता है।

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