लाल बहादुर शास्त्री ने गाँधी के नारे को ही बदल दिया था

महात्मा  गाँधी और लाल बहादुर शास्त्री
महात्मा गाँधी और लाल बहादुर शास्त्री

लखनऊ: कुशल नेतृत्व के धनी और सादगी के प्रतीक लाल बहादुर शास्त्री ने अपने आदर्श महात्मा गाँधी के ही नारे को बदल दिया था. दरअसल दुसरे विश्व युद्ध के दौरान इंग्लैंड का साम्राज्य भारत से पूरी तरीके से खत्म करने के लिए नेताजी ने 1942 में आज़ाद हिन्द फ़ौज को ‘दिल्ली चलो’ का नारा दिया था.

इसके बाद महात्मा गांधी ने 8 अगस्त 1942 में बम्बई (आज का मुंबई) में रहते हुए अंग्रेजों को ‘भारत छोड़ो’ का नारा दिया. इसके साथ ही भारत की जनता को करो या मरो का भी गाँधी जी ने नारा दिया. आन्दोलन प्रचंड पर था. देश के नौजवान से लेकर बच्चे, बूढ़े तक अलग ही जोश से भर गए थे.

इसके बाद गाँधी जी सरकारी सुरक्षा में पुणे स्तिथि आगा खान पैलेस में चले गए. ये वही समय था जब 9 अगस्त 1942 के दिन जब लाल बहादुर शास्त्री ने मौके की नजाकत को भांपते हुए इलाहबाद पहुंचकर ‘करो या मरो’ गांधीवाद नारे को ‘मरो नहीं, मारो’ में बदल दिया. शास्त्री द्वारा दिए गए इस नारे के बाद ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ चल रहे आन्दोलन को एक नई हवा मिल गई. पूरे ग्यारह दिन तक अंडरग्राउंड रहते हुए इस आन्दोलन को प्रचंड रूप देने के बाद 19 अगस्त 1942 के दिन शास्त्री गिरफ्तार कर लिए गए.

 

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