इस खबर से जानें क्‍या हैं भीमा-कोरेगांव विवाद, पढ़ें पूरा इतिहास

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नई दिल्ली। पुणे में सोमवार को दो गुट आपस में भिड़ गये थे, जिसमें एक व्‍यक्‍ति की मौत हो गई, और कई लोग लोग घायल थे। धीरे-धीरे यह हिंसा उग्र होकर माहाराष्‍ट्र तक पहुंच गई है। जिससे आज पूरा महाराष्‍ट्र के बंद होने की नौबत आ गई है। इस हिंसा की आग जब राज्‍य के दूसरे इलाकों में पहुंची तो काफी जन हानि हुई है।

राज्य के कई इलाकों में बसों और अन्‍य वाहनों को नुकशान पहुंचाया गया है। तो वहीं मुंबई में  मंगलवार को दलित संगठन आरपीआई से जुड़े लोगों ने कई जगह पर ‘रास्ता रोको’ प्रदर्शन किया।

यहां पढ़ें- भीमा-कोरेगांव का इतिहास

अगर भीमा-कोरेगांव के इतिहास की बात करें तो यहां पर एक 1 जनवरी 1818 को भीमा की लड़ाई हुई थी, जो ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और मराठा साम्राज्य के पेशवा गुट के बीच लड़ा गया था।

ये लड़ाई धीरे-धीरे एक युद्ध का रूप ले लिया था। मराठा साम्राज्‍य का मार्गदर्शक और नेतृत्‍व उस समय बाजीराव द्वितीय कर रहे थे।

लड़ाई जब बनी युद्ध

जब बाजीराव द्वितीय अपने 28,000 मराठाओं के साथ पुणे पर आक्रमण के लिए निकले थे। तभी राश्‍ते में उनका सामना अंग्रजों के ईस्ट इंडिया कंपनी के एक 800 सैनिकों से हुआ।

तब उन्‍होंने अपने 2000 हजार सैनिक इन पर हमला करने के लिए भेजे। जिस गुट से मराठाओं का सामना हुआ वो सैनिकों में मुख्य रूप से बॉम्बे नेटिव इन्फैंट्री से संबंधित महार रेजिमेंट के सैनिक शामिल थे।

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कोरेगांव स्तंभ शिलालेख महत्व

महार और मराठों के बीच हुए युद्ध में कोरेगांव स्तंभ में जो शिलालेख बना हुआ है। उसे अग्रेंजो ने अपनी वीरता के प्रतीक के रूप में बनवाया था। इस लेख में उन 49 शहीद सैनिकों का नाम लिखा है जो महार रेजीमेंट में थे।

जिसे अग्रेंजों के बाद अब महार समुदाय के लोग अब शक्‍ति प्रतीक के रूप में मानते हैं। सोमवार को इसी स्मारक की ओर बढ़ते वक्त दो गुटों में झड़प हो गई, जिसकी चपेट में आज लगभग पूरा महाराष्‍ट्र शामिल है।

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