प्रसवकाल में ब्लीडिंग की समस्या से बचाएगा लाइफ रैप

आगरा। प्रसव काल के दौरान होने वाली मौत में 35-40 फीसदी महिलाएं सिर्फ इस कारण अपनी जान गंवा बैठती है कि तेज गति से हो रही ब्लीडिंग को सही समय पर नहीं रोका जा सका। कभी अस्पताल तक पहुंचने में देरी के कारण तो कभी सही उपचार न मिलने से।

मरने वाली महिलाओं में गांव देहात की महिलाओं का ग्राफ ऊंचा होता है। लेकिन इस मौत के ग्राफ को लाइफ रैप से आधा किया जा सकता है। यानि मात्र 4-5 हजार की कीमत का लाइफ रैप (नॉन न्यूमैटिक एंटी शॉक गारमेंट) उन महिलाओं के लिए वरदान साबित हो सकता है।

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इसी उद्देश्य के साथ कलाकृति ग्राउंड में 13-17 जनवरी तक होने जा रही कांफ्रेस आईकोग (ऑल इंडिया कांग्रेस ऑफ ऑब्स्टेट्रिक एंड गायनेकोलॉजी) में इस विषय पर वर्कशॉप भी आयोजित की गई है, जिसमें कांफ्रेंस में शामिल होने वाले 6000 से अधिक देशी विदेशी डॉक्टरों को लाइफ रैप के बारे में जानकारी देकर उन्हें प्रशिक्षित भी किया जाएगा।

पीपीएच (पोस्ट पार्टल हैम्ब्रेज) यानि लगातार और तेज गति से होने वाली ब्लीडिंग। आईकोग के चेयरमैन सचिव डॉ. नरेन्द्र मल्होत्रा के अनुसार डिलीवरी के दौरान 10 फीसदी महिलाओं को यह समस्या होती है। जिसमें से 2 फीसदी महिलाएं मर जाती हैं। जिसकी मुख्य वजह एनीमिया या पहले कई बार हो चुके ऑपरेशन हो सकते हैं। कई बार बच्चे के बड़ा आकार भी इसकी वजह हो सकता है। जिससे मांसपेशियों की रिट्रेक्टाइल प्रोपर्टी (सिकुड़ने की क्षमता) कम हो जाती है और रक्त लगातार बहता रहता है।

आईकोग आर्गनाइजिंग कमेटी की सचिव डॉ. जयदीप मल्‍होत्रा के अनुसार सामान्य तौर पर प्रसव के 3-5 मिनट के बाद रक्त का बहना बंद हो जाता है। लेकिन ऐसे मामलों में गर्भाशय की मांपेशियां न सिकुड़ने से रक्त लगातार बहता रहता है। कई बार मरीज को बचाने के लिए ऐसे मामलों में गर्भाशय को निकालना भी पड़ सकता है। कई बार मरीज कोमा में आ जाता है या फिर हृदय के काम करना बंद कर देने पर मृत्यु हो जाती है।

लाइफ रैप ऐसे मामलों में जान गंवाने वाली महिलाओं के लिए वरदान हो सकता है। लाइफ रैप न सिर्फ दिमाग और हृदय तक रक्त संचरण को सुचारू कर देता है बल्कि सही इलाज मिलने तक के लिए 4-5 घंटों की अवधि को बढ़ा भी देता है। यानि सभी स्त्री व प्रसूति रोग विशेषज्ञों की एम्बूलेंस में इसकी सुविधा प्रसव काल के दौरान कई महिलाओं की जान को बचा सकती है।

अमेरिका की डॉ. सुलैन मिलर ने किया लाइफ रैप का अविष्कार

दक्षिणी भारत के कुछ गांव में सर्वे करने पर अमेरिका की डॉ. सुलैन मिलर को यह एहसास हुआ कि प्रसव के दौरान गांव देहात की ज्यादातर महिलाएं सिर्फ इस कारण दम तोड़ देती है कि सही समय पर उनकी ब्लीडिंग को नहीं रोका जा सका। इसलिए उन्होंने एक ऐसे स्पेशल फाइवर स्ट्रेचिबल ब्लैक सूटनुमा नॉन न्यूमेटिक एंटी शॉक गारमेंट (वॉशएबल है) बनाया जिसे पहनने पर रक्त संचरण को नियमित कर प्रसव काल में ब्लीडिंग के कारण होने वाली मौतों को 50 फीसदी तक कम किया जा सकता है।

आईकोग आर्गनाइजिंग कमेटी के चेयरमैन व भारत में सबसे पहले लाइफ रैप को प्रयोग में लाने वाले डॉ. नरेन्द्र मल्होत्रा ने बताया कि एक साल से रेनबो हॉस्पीटल में इसका प्रयोग न सिर्फ हॉस्पीटल में बल्कि एम्बूलेंस में किया जा रहा है। मात्र 4-5 हजार की कीमत के लाइफ रैप को प्रयोग करने पर मरीज पर कोई आर्थिक बार भी नहीं पड़ता।

कैसे करते हैं प्रयोग

ब्लैक सूट की तरह दिखने वाले लाइफ रैप में बांच बेल्ट होती हैं। फ्री साइज की पहली बेल्ट को पेट पर, दूसरी को पेल्विक पर और बाकी की तीन बेल्ट को पैरों पर बांधा जाता है। यह मांसपेशियों पर दबाव डाल

सभी पीएचसी व सीएचसी पर हो मीनोप्रोस्टॉल की सुविधा

पिछले कई वर्षों से डब्ल्यूएचओ द्वारा मीजोप्रोस्टोल गोली को प्रमोट किया जा रहा है। विशेषकर गांव देहात के क्षेत्रों में। एसएन मेडिकल कॉलेज स्त्री व प्रसूति रोग विभागाध्यक्ष व आईकोग आर्गनाइजिंग कमेटी की साइंटिफिक चेयरपर्सन प्रो. सरोज सिंह ने बताया कि प्रसव के तुरन्त बाद इस गोली को सभी महिलाओं को देना जरूरी है।

यह गोली गांव देहात की उन महिलाओं को प्रसव काल में होने वाली ब्लीडिंग के कारण मरने वाली महिलाओं को बचाने में वरदान है, जहां ट्रेंड लोग नहीं है। क्योंकि इसे रखने के लिए फ्रिज की भी जरूरत नहीं और गोली के रूप में होने से लेना भी आसान है।

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