कुछ ऐसा रहा लिज्जत पापड़ का 80 रुपए से 800 करोड़ तक का सफर, ये है करिश्माई कहानी

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दुनिया में कई ऐसे लोग हैं जिनके बारे में जब आप सुनते हैं या जानते हैं तो आपको बड़ा आश्चर्य होता ही आखिर इनहोने ऐसा किया कैसे। कहीं ना कहीं आप ये भी सोचते होंगे मुझे भी ऐसा कुछ करना चाहिए जिससे देश-दुनिया मुझे जाने। कई लोगों कहानी इतनी दिलचस्प और इंस्पायरिंग होती है, जिसे सुनने के बाद हम बहुत ज्यादा प्रभावित होते हैं। ऐसी ही एक 90 दशक की कहानी है जिसे ज़्यादातर लोग ज़रूर जानते होंगे ।

लिज्जत पापड़

कुछ ऐसा रहा लिज्जत पापड़ का 80 रुपए से 800 करोड़ तक का सफर, ये है करिश्माई कहानी…

जानें क्या और कौन हैं वो….

बात 90 दशक की है जब लगभग सभी के घर में ब्लैक अँड व्हाइट टीवी हुआ करती थी। टीवी पर आने वाली फ़िल्म और धारावाहिकों के बीच में आने वाले विज्ञापनों में एक ऐसा विज्ञापन भी था जो काफ़ी चर्चित था। “कर्रम कुर्रम-कुर्रम कर्रम” के जिंगल के साथ लिज्जत पापड़ का एड आता था। लिज्जत पापड़ के बारे में किसी को बताने की ज़रूरत नहीं है। यह एक ऐसा पापड़ है जिसके बारे में देश का हर व्यक्ति जानता है।

लिज्जत पापड़…

लिज्जत पापड़ का टेस्ट आज भी लोगों के दिलों दिमाग ज़रूर बसा, अगर उनसे कोई पूछे तो वे ज़रूर उसके टेस्ट को डिफ़ाइन कर सकते हैं। मामूली सा पापड़ समय के साथ-साथ बढ़ता गया और एक बड़ा ब्रांड बन गया। क्या आपको अंदाज़ा है कि लिज्जत पापड़ एक मामूली से पापड़ से बड़े ब्रांड तक का सफर कैसा रहा है।

एक पापड़ से बड़े ब्रांड तक का सफर….

मात्र 80 रुपए का लोन लेकर शुरू किया गया लिज्जत पापड़ का बिज़नेस आज 800 करोड़ तक पहुँच गया है। इसकी शुरुआत होती है 1950 से, जब गुज़ारत की सात महिलाओं ने पापड़ बनाने का काम शुरू किया। पापड़ बनाने पर सहमति इसलिए बनी, क्योंकि ये महिलाएँ केवल यही करना जानती थीं। उनके पास सबसे बड़ी समस्या यह थी कि उनके पास इस बिज़नेस को चलाने के लिए पैसे नहीं थे। इस वजह से उन्होंने एक सामाजिक कार्यकर्ता छगनलाल कमरसी पारेख से 80 रुपए उधार लेकर काम शुरू करना पड़ा। इस पैसे से पापड़ को एक उद्योग में बदलने के लिए ज़रूरी चीज़ें ख़रीदी गयी। मेहनत और हुनर की वजह से काम चल पड़ा और कम्पनी खड़ी हो गयी।

कहानी में ट्विस्ट….

15 मार्च 1959 को मशहूर व्यापारी भूलेश्वर मुंबई के एक मशहूर बाज़ार में इस पापड़ को बेचने जाने लगे। उस समय महिलाएँ दो ब्राण्ड के पापड़ बनाया करती थीं। एक पापड़ सस्ता था और दूसरा थोड़ा महँगा था। उस समय छगनलाल ने महिलाओं को सलाह दी कि वो अपनी गुणवत्ता के साथ समझौता ना करें। महिलाओं ने उनकी बात मानते हुए केवल गुणवत्ता वाले पापड़ बनाने पर ही अपना ध्यान लगाना शुरू किया। लिज्जत ने सहकारी योजना के तहत विस्तार करना शुरू कर दिया। देखते ही देखते इस बिज़नेस में 25 लड़कियाँ काम करने लगीं। पहले साल कम्पनी ने 6196 रुपए का बिज़नेस किया।

बढ़ता ही गया बिजनेस…..

धीरे-धीरे लोगों के प्रचार और समाचार पत्रों में लिखे जाने वाले लेखों के माध्यम से यह मशहूर होने लगा। काम का आलम यह तह कि दूसरे ही साल इस कम्पनी में कुल 300 महिलाओं ने काम करना शुरू कर दिया। वर्ष 1962 में पापड़ का नाम लिज्जत और संगठन का नाम श्री महिला उद्योग लिज्जत पापड़ रखा गया था। आज बाज़ार में इस ब्राण्ड के पापड़ के साथ ही कई अन्य चीज़ें भी मौजूद हैं। याहू की एक रिपोर्ट की मानें तो लिज्जत पापड़ के सफल सहकारी रोज़गार ने लगभग 43 हज़ार महिलाओं को काम दिया है।

तो ऐसी थी लिज्जत पापड़ की कहानी। कोई भी काम बड़ा या छोटा नहीं होता बस काम को करने की लगन चाहिए।

अगर आपके पास भी ऐसी कोई कहानी है जो हम दुनिया तक पहुंचा सकते हैं तो हमे ईमेल करे….

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