महागठबंधन- “तेरा मुझसे है पहले का नाता कोई, पर कितना सार्थक?”

“FEELINGS DON’T LEAVE,THEY CHANGE”…

यह कोट तो वैसे काफी सेंटीमेंटल है लेकिन राजनीतिक दायरे में कही न कही फिट किया जा सकता है. राजनीती में तो किसी को बिना “रिसाईज़” किए, कही भी फिट किया जा सकता है..

बिना किसी अनुमान के कहा जा सकता है कि राजनीतिक भावनाए हालात देख के रंग बदल लेती है.

बड़े बड़े राजनेता और बड़ी पार्टिया अपनी विचारधारा का दायरा तो बनाती है पर राजनीतिक हितो और सत्ता के नशे की मज़बूरी के चलते धीरे धीरे लकीरों से दूर खिसक जाती है.

तो आपको बता दे कि हम ये थोड़ी मिलावटी बाते क्यों कर रहे है .ऐसा इसीलिए, क्यूंकि हम बात करने जा रहे है महागठबंधन की जोकि 2019 के आम चुनावो के लिए, छेत्रीय दलों का एक भारतीय राजनीतिक गठबंधन है.

इस महा गठबंधन की महा विशेषता ये है कि बीजेपी और विपक्षी दल, दोनों ही इस बात से इत्तेफाक रखते है कि इस महागठबंधन का एकलौता मुद्दा है “मोदी हटाओ”.

19 जनवरी को ममता बैनर्जी की अगुवाई में विपक्षी एकजुटता दिखी थी, लेकिन अब जब चुनाव कुछ कदम दूर है तो ये “एकजुटता” थकी-हारी नज़र आ रही है.

इस “UNITED INDIA” रैली से कई “जनम जनम का साथ है हमारा तुम्हारा” के काल्पनिक सिद्धांत को हवा देते बयान, बड़े छोटे राजनेताओ द्वारा फेके गये…लेकिन बयान तो वही है पर राजनेता गायब होते चले गये.

अगर इस गठबंधन की परंपरा के मूल की बात करे तो इसकी शुरुवात हुई थी 1977 में, जनता पार्टी के मोरारजी देसाई के प्रयासों से. जिनका कार्यकाल 2 साल में ही REST IN PEACE हो गया था.

जिस परंपरा की नीव ही कमज़ोर हो उसका भविष्य कैसा होगा इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है.

फिर जनता पार्टी को तोड़ कर चौधरी चरण सिंह पीएम बने पर 6 महीने भी अपनी सरकार न चला सके .

गठबंधन का दौर यही समाप्त नही हुआ ,इसके बाद 1989 में बोफोर्स रथ के सहारे बी पी सिंह ने गठबंधन की सरकार बनाई जोकि एक साल की मेहमान बनके रह गयी..

अब बी पी सिंह की जगह चंद्रशेखर ने ले ली,कांग्रेस के समर्थन के बावजूद सरकार

223 दिन से अधिक सांसे न ले सकी.

फिर 1996 में मैदान में आए अटल बिहारी वाजपेयी ,लेकिन उनकी सरकार बहुमत साबित नही कर पाई और 13 दिन बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा.

फिर एच डी देवगोड़ा 13 दलों के समर्थन के साथ सरकार बनाने निकले लेकिन उनकी सरकार भी 1 साल के भीतर ही गिर गयी.

अब बारी इंद्रा कुमार गुजराल की थी, कांग्रेस का समर्थन भी था लेकिन गुजराल साहब भी अपनी सरकार के साथ 332 दिन ही टिक पाए.

1998 में बाजपाई जी का जादू चला, लेकिन बहुमत 1 सीट दूर रह गया. जोड़ तोड़ से सरकार बनी पर 13 महीने में राजनितिक उठापटक की शिकार हो गई. जिसकी वजह से उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा.

 

गठबंधन का इतिहास खुद गवाह है की गठबंधन के सफल होने की संभावना कितनी है.

और आज के समय में इसका सबसे उम्दा उदाहरण महा गठबंधन स्वयं है. शुरुवात में जिस तरीके की बयानबाजी हुई और अब की ज़मीनी हकीकत अपने आप में बोहत कुछ कहती है.

अब सोचना भारत की जनता को की उन्हें मायावती जी के मजबूर सरकार के सपने को सच करना है या मजबूत सरकार बनानी है.

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