महामना ने जब जूता नीलामी के लिए ऱख दिया

malviyajiiमहामना मदन मोहन मालवीय की आज 154वीं जयन्ती है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक के रूप में सभी मालवीय जी को जानते हैं। आपका जन्म 25 दिसंबर 1861 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में हुआ था एवं निधन 12 नवंबर 1946 को बनारस में हुआ था। मालवीय जी 1909, 1918, 1932, 1933 में चार बार कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। ‘सत्यमेव जयते’ शब्द के प्रचार प्रसार में आपकी अहम भूमिका रही। शिक्षा, पत्रकारिता, वकालत में महामना जी ने कई अहम सक्रिय काम किए।

महामना मदन मोहन मालवीय ने 1916 में प्रतिष्ठित बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की। वे भारत के पहले और अन्तिम व्यक्ति थे जिन्हें महामना की सम्मानजनक उपाधि से विभूषित किया गया। कांग्रेस के निर्माताओं में विख्यात मालवीयजी ने उसके द्वितीय अधिवेशन (कलकत्ता-1886) से लेकर अपनी अन्तिम साँस तक स्वराज्य के लिये कठोर तप किया।

चौरा-चौरा कांड में 170 दोषियों को फांसी की सजा सुनाई गई, जिसमें से पंडित जी ने 151 को छुड़ा लिया। राष्ट्रनेता मालवीय जी के बारे में स्वयं पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है, ‘अपने नेतृत्वकाल में हिन्दू महासभा को राजनीतिक प्रतिक्रियावादिता से मुक्त रखा और अनेक बार धर्मों के सहअस्तित्व में अपनी आस्था को अभिव्यक्त किया।’

प्रयाग के भारती भवन पुस्तकालय, मैकडोनेल यूनिवर्सिटी हिन्दू छात्रालय और मिण्टो पार्क के जन्मदाता, बाढ़, भूकम्प, सांप्रदायिक दंगों व मार्शल ला से त्रस्त दु:खियों के आँसू पोंछने वाले मालवीयजी को ऋषिकुल हरिद्वार, गोरक्षा और आयुर्वेद सम्मेलन तथा सेवा समिति, ब्वॉय स्काउट तथा अन्य कई संस्थाओं को स्थापित अथवा प्रोत्साहित करने का श्रेय प्राप्त हुआ।

मालवीयजी के नेतृत्व में प्रथम उत्थान में नरम और गरम दलों के बीच की कड़ी वो  ही थे जो गान्धी-युग की कांग्रेस में हिन्दू मुसलमानों एवं उसके विभिन्न मतों में सामंजस्य स्थापित करने में प्रयत्नशील रहे। एनी बेसेंट ने ठीक कहा था कि “मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि विभिन्न मतों के बीच, केवल मालवीयजी भारतीय एकता की मूर्ति बने खड़े हुए हैं।”

यहां उनका एक प्रसंग उल्लेखनीय है। मालवीयजी जब काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के लिए चंदा जमा कर रहे थे तो उन्होंने एक नियम बनाया था कि जिस के यहां जाऊंगा खाली हाथ न आऊंगा वैसे भी मालवीय जैसे विद्वान को कौन भिक्षा नहीं देता? उनकी शुचिता, व्यक्तित्व की गरिमा, त्याग की भावना व अविरल राष्ट्रप्रीति में ऐसा चमत्कार था कि राजा से लेकर रंक तक उससे अभिभूत हुए बिना नहीं रहे। काशी हिन्दू विविद्यालय के लिए भूखण्ड की समस्या हो या फिर निर्माण के लिए धनराशि का समाधान महामना के जादुई व्यक्तित्व से ही संभव हुआ।

महामना अपनी महान सेवाओं से भी अधिक महान थे। वे एक ऐसी शक्ति का नाम थे जिसमें मिट्टी के उपकरणों से भी फौलाद के अस्त्र डालने की क्षमता थी। मस्तिष्क के समन्यवादी एवं हृदय से अत्यन्त संवेदनशील महामना गरीबी में जन्मे, गरीबी में पले और दुनिया को अपना सबकुछ समर्पित कर दिया।

महामना को अपनी सेवाओं से संतोष नहीं हो सका। मृत्यु से दस दिन पूर्व उन्होंने कहा था ‘‘मैं मोक्ष नहीं चाहता, मैं एक और जन्म देशऔर विविद्यालय की सेवा करने के लिए लेना चाहता हूं। मालवीय जी काशी हिन्दू विविद्यालय के लिए धन मांगते हुए देश के धनाढ्य़ एवं राजा महाराजाओं के पास जाते तो कई जगह उन्हें आसानी से तथा कईजगह बड़ी मुश्किल से कुछ धन की प्राप्ति होती थी। उनका संकल्प था कि वह जहां कही भी धन लेने जायेंगे वहां से बिना कुछ धन लिए वापस नहीं आयेंगे।

मालवीय जी जब हैदराबाद के निजाम जो भारत के ही नहीं विश्व के धनाडय़ लोगों में गिने जाते थे के यहां काशी हिन्दू विविद्यालय निमार्ण के लिए धन मांगने पहुंचे। निजाम ने हिन्दू विविद्यालय के निर्माण को धन देने से मना कर दिया। मालवीय जी ने बहुत से तर्क देकर निजाम साहब को राजी करने का प्रयास किया लेकिन वह नहीं माने। महामना ने उन्हें अपने व्रत के बारे में बताया कि वह बिना कुछ लिए वापस नहीं जाने के लिए संकल्पित है। इसपर निजाम ने अपनी पुरानी जूती बढ़ाते हुए कहा ठीक है हिन्दू विश्वविद्यालय के लिए मेरी यह जूती ले जाइए। महामना ने सहर्ष उन जूतियों को उठा लिया और अभिवादन कर निजाम साहब के महल से अपने ठहरने के स्थापन पर आ गये। मालवीय जी ने हैदराबाद में उनकी जूती निलाम करने की घोषण की। यह सूचना निजाम के पास पहुंची तो उन्हों ने कई यत्न किया लेकिन जब बात नहीं बनी तो निजाम ने मालवीय जी को गिरफ्तार करने तथा जेल में रखने तक की बात कही। मालवीय जी देश के बड़े नेता ही नहीं बल्कि अंग्रेजी हुक्मरानों में भी बहुत ही सम्मानित महानुभाव माने जाते थे। निजाम ने मालवीय जी से कहा कि वह क्या करें की जूतियां नीलाम न हों। महामना ने कहा कि काशी हिन्दू विविद्यालय में पढ़ने के लिए भवन तथा रहने के लिए छात्रावास तो बन गये हैं लेकिन अध्यापकों के रहने के लिए घरो का बनना बाकी है अत: निजाम साहब एक कालोनी बना दें जिसक नाम उन्हें के नाम पर निजाम हैदराबाद कालोनी होगा। निजाम के धन से बनी कालोनी हैदराबाद के नाम से कैंपस में स्थित है।

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