भाजपा के चाणक्य ने बनाया मिशन-2019 का मास्टरप्लान, बदल जाएगा एनडीए का चेहरा

नई दिल्ली: अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव को भले ही अभी लगभग एक साल का समय बाकी है लेकिन इस चुनाव की तपिश अभी से ही महसूस होने लगी है। इस चुनाव को लेकर जो तस्वीरें अभी तक सामने आई है उससे तो यही लग रहा है कि यह चुनावी जंग मुख्य रूप से लगातार अपने ही सहयोगियों के वार का सामना कर रही मोदी सरकार और एकता की ताकत झोंक रही विपक्ष के बीच में है, जिसमें भाजपा कुछ कमजोर नजर आ रही है। हालांकि अब भाजपा ने अपने कमजोर पक्षों को मजबूत करना शुरू कर दिया है।

दरअसल, लोकसभा चुनाव को लेकर जिस तरह से पूरे देश की भाजपा विरोधी पार्टियां एकजुट होती नजर आ रही हैं, भाजपा के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। इससे ज्यादा भाजपा के लिए अपने ही सहयोगियों की नाराजगी है। इसी वजह से अब भाजपा ने अपने रूठे सहयोगियों को मनाने की कवायद शुरू कर दी है। इसके अलावा भाजपा ने उन सभी कमियों को दूर करने की कोशिश शुरू कर दी है, जो आम चुनावों में भाजपा के लिए चिंता का विषय हो सकती है। इसके अलावा इस चुनाव में आरएसएस भी अहम भूमिका निभा सकती है।

आपको बता दें कि अमित शाह बुधवार को महाराष्ट्र के अपने सबसे ख़ास सहयोगी शिवसेना को मनाने के लिए उद्धव ठाकरे से मुलाक़ात करेंगे। बीते काफी समय से भाजपा और शिवसेना के संबंधों में खटास देखने को मिल रही है। शिवसेना महाराष्ट्र की भाजपा सरकार और केंद्र की मोदी सरकार के खिलाफ बराबर हमला बोले हुए है। कभी किसानों का मुद्दा उठाते हुए तो कभी पेट्रोल और डीजल के बढ़ते दामों को लेकर शिवसेना बराबर भाजपा सरकार को आड़े हाथों ले रही है। यह वही शिवसेना है जिसने बीते दिनों खुद को भाजपा का सबसे बड़ा दुश्मन करार दिया था।

केवल इतना ही नहीं शिवसेना ने बीते दिनों यह भी साफ़ कर दिया था कि अब वह भाजपा के साथ मिलकर कोई चुनाव नहीं लड़ेगी। बीते दिनों हुए पालघर उपचुनाव में ऐसा हुआ भी। इस उपचुनाव में भाजपा और शिवसेना ने एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ा था।

आपको बता दें कि 2014 के चुनाव में बीजेपी ने अकेले दम पर 272 का जादुई आंकड़ा छू लिया था। जबकि एनडीए के दो दर्जन सहयोगियों में से 22 दलों ने भी 54 सीटें जीतीं थीं। जिससे लोकसभा में एनडीए की कुल 335 सीटें रहीं। एनडीए में सांसदों की संख्या के हिसाब से शिवसेना ही सबसे प्रमुख सहयोगी पार्टी रही, जिसके 18 सांसद रहे।

लोकसभा चुनाव-2019 में जहां विपक्ष एकजुट होकर भाजपा की सत्ता को उखाड़ फेंकने की जद्दोजहद में लगी हुई है। वहीँ भाजपा नीत राजग के कई घटक ही केंद्र सरकार से नाराज चल रहे हैं, कई घटक तो बगावती रुख अपनाने हुए केंद्र सरकार पर बराबर हमला तक कर रहे हैं। इसी वजह से भाजपा अपने रूठे हुए सहयोगियों को मनाने की कवायद में जुट गई है।

उधर, दक्षिण भारत में इकलौते प्रमुख सहयोगी दल टीडीपी ने मार्च में एनडीए का साथ छोड़ दिया। 16 सांसदों वाले चंद्रबाबू नायडू ने केंद्र पर आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा न देने पर वादाखिलाफी का आरोप मढ़ने के बाद यह फैसला किया।  उन्होंने अपने दो मंत्रियों से इस्तीफे दिलवा दिए।यह बीजेपी के लिए बड़ा झटका माना गया। जिसके बाद अन्य सहयोगी दलों ने दबाव की राजनीति शुरू कर दी।

इसके अलावा पंजाब की शिरोमणि अकाली दल और बिहार की जनता दल यूनाइटेड भी समय समय पर भाजपा सरकार के कार्यप्रणालियों पर उंगलियां उठाती रही हैं। ऐसे में भाजपा के सामने अपने सहयोगियों को एकजुट करना सबसे बड़ी चुनौती है।

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